फर्जी खबरों पर केंद्र की बड़ी कार्रवाई

फर्जी खबरों पर लगाम के लिए केंद्र की बड़ी पहल

फर्जी खबरों के बढ़ते प्रभाव के बीच केंद्र सरकार ने इसके खिलाफ व्यवस्था मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। संसदीय स्थायी समिति की फर्जी खबरों और गलत सूचना से निपटने के लिए की गई 12 सिफारिशों में से 9 को केंद्र ने स्वीकार कर लिया है। हालांकि, तीन महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार ने अभी अंतिम जवाब नहीं दिया है। इनमें ‘फर्जी खबर’ की स्पष्ट परिभाषा, फैक्ट-चेकिंग से जुड़ी संस्थाओं और तंत्र की व्यवस्था तथा फर्जी खबर फैलाने वालों के लिए दंडात्मक प्रावधान शामिल हैं।

सोशल मीडिया और मैसेजिंग सेवाओं के जरिए सूचना तेजी से फैलती है। ऐसे में किसी खबर की सत्यता जांचने से पहले वह बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंच सकती है। समिति ने सरकार, मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और नागरिकों के संयुक्त प्रयास पर जोर दिया था।

केंद्र ने 12 में से 9 सिफारिशें स्वीकार कीं

संसदीय स्थायी समिति ने फर्जी खबरों से निपटने के लिए व्यापक और बहुस्तरीय व्यवस्था की जरूरत बताई थी। अब केंद्र सरकार ने 12 में से 9 सिफारिशों को स्वीकार किया है, जबकि तीन पर जवाब फिलहाल अंतरिम प्रकृति का है। इन तीन विषयों का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि ‘फर्जी खबर’ की परिभाषा सीधे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारिता से जुड़ती है। फैक्ट-चेकिंग की जिम्मेदारी और गलत सूचना फैलाने पर दंड तय करना भी कानूनी रूप से संवेदनशील विषय हैं।

रिपोर्ट में इसे व्यापक सामाजिक और तकनीकी चुनौती बताते हुए सरकार, मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और नागरिकों के बीच समन्वय पर जोर दिया गया है।

फर्जी खबरों की समस्या क्यों गंभीर है

आज समाचार केवल अखबार, टीवी या वेबसाइटों तक सीमित नहीं हैं। सोशल मीडिया, वीडियो प्लेटफॉर्म और मैसेजिंग ऐप लोगों के लिए सूचना के प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। इससे खबरें तेजी से लोगों तक पहुंचती हैं, लेकिन गलत जानकारी के प्रसार का जोखिम भी बढ़ता है।

फर्जी खबर किसी वास्तविक घटना, तस्वीर या बयान को गलत संदर्भ में पेश करके भी तैयार की जा सकती है। पुरानी तस्वीर को नई घटना से जोड़ना या किसी बयान को काटकर अलग अर्थ में साझा करना इसके उदाहरण हैं। डिजिटल माध्यम में ऐसी सामग्री कम समय में बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंच सकती है। बाद में जानकारी गलत साबित होने पर भी उसका प्रभाव पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं होता।

इसी चुनौती को देखते हुए समिति ने फर्जी खबरों की पहचान, तथ्य-जांच, शिकायत निवारण और जन-जागरूकता को एक साथ मजबूत करने की जरूरत बताई है।

फर्जी खबर’ की परिभाषा सबसे बड़ा सवाल

सरकार ने जिन तीन मुद्दों पर अंतिम जवाब नहीं दिया है, उनमें ‘फर्जी खबर’ की परिभाषा सबसे महत्वपूर्ण है। संसदीय समिति ने कहा था कि ‘फेक न्यूज’ शब्द की स्पष्ट वैधानिक परिभाषा नहीं है और misinformation तथा fake news के बीच भी अस्पष्टता हो सकती है।

परिभाषा तय करना इसलिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि हर गलत जानकारी जानबूझकर फैलाया गया झूठ नहीं होती। अनजाने में हुई तथ्यात्मक गलती, अधूरी जानकारी, व्यंग्य, राय और जानबूझकर फैलाई गई गलत सूचना अलग-अलग स्थितियां हैं। यदि इन्हें एक ही श्रेणी में रखा जाए, तो वैध पत्रकारिता और अभिव्यक्ति पर असर पड़ सकता है।

समिति ने गलत सूचना से मुकाबला करते हुए संविधान द्वारा दिए गए अभिव्यक्ति के अधिकार और व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा का संतुलन बनाए रखने की बात कही थी।

फैक्ट-चेकिंग व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत

फर्जी खबरों पर कार्रवाई में फैक्ट-चेकिंग की भूमिका अहम है। केंद्र सरकार के पास PIB के तहत Fact Check Unit मौजूद है। मार्च 2026 में सरकार ने राज्यसभा में बताया था कि यह इकाई नवंबर 2019 में स्थापित हुई और केंद्र सरकार से संबंधित फर्जी खबरों तथा गलत सूचना की पहचान करती है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2023 में Fact Check Unit को 6,623 actionable queries मिलीं और 557 फर्जी खबरों की पहचान हुई। 2024 में 6,320 queries में 583 फर्जी खबरें पहचानी गईं। 2025 में 21,289 actionable queries मिलीं और 611 फर्जी खबरों की पहचान हुई। 2026 में 15 मार्च तक 2,463 queries में 119 मामलों को फर्जी खबर के रूप में पहचाना गया।

इन आंकड़ों से गलत सूचना की निगरानी की जरूरत स्पष्ट होती है। हालांकि, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सामग्री की मात्रा बहुत बड़ी है। इसलिए समिति ने फैक्ट-चेकिंग संस्थाओं और अन्य हितधारकों के बीच सहयोग तथा तकनीकी साधनों के विकास पर जोर दिया था।

AI ने बढ़ाई चुनौती, तकनीक से मिलेगा जवाब

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने फर्जी खबरों की चुनौती को और जटिल बना दिया है। AI की मदद से तस्वीरें, वीडियो, आवाज और टेक्स्ट तैयार करना आसान हो गया है। इससे वास्तविक और कृत्रिम सामग्री के बीच अंतर करना कई मामलों में कठिन हो सकता है।

संसदीय समिति ने AI के इस्तेमाल को लेकर संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत बताई थी। फर्जी खबरों की पहचान में AI और तकनीक के इस्तेमाल के साथ मानव निगरानी बनाए रखने तथा AI से बनाए गए वीडियो और सामग्री की पहचान व लेबलिंग की संभावनाओं पर विचार करने की सिफारिश की गई थी।

तकनीक आधारित फैक्ट-चेकिंग महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन मानव विशेषज्ञों और संबंधित एजेंसियों का समन्वय भी जरूरी रहेगा।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही पर जोर

फर्जी खबरों के प्रसार में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका महत्वपूर्ण है। समिति ने एल्गोरिदम, प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और गलत सूचना को बढ़ाने वाले सिस्टम संबंधी जोखिमों पर ध्यान देने की जरूरत बताई है।

समिति ने एल्गोरिदम की पारदर्शिता, दोहराए जाने वाले उल्लंघनों पर सख्त कार्रवाई और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर विचार करने की सिफारिश की थी। प्लेटफॉर्म की जवाबदेही बढ़ाते हुए डिजिटल अभिव्यक्ति और नवाचार की स्वतंत्रता बनाए रखना भी चुनौती होगी।

शिकायत निवारण और मीडिया साक्षरता जरूरी

फर्जी खबर सामने आने के बाद केवल उसकी पहचान पर्याप्त नहीं है। लोगों के पास शिकायत दर्ज कराने और उसके समाधान की स्पष्ट व्यवस्था भी होनी चाहिए। समिति ने समयबद्ध grievance redressal framework और शिकायतों की डिजिटल tracking व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया था।

इसके साथ नागरिकों में मीडिया साक्षरता बढ़ाना भी जरूरी है। समिति ने स्कूल और कॉलेज स्तर से media literacy को बढ़ावा देने की सिफारिश की थी। स्रोत की विश्वसनीयता समझना, तस्वीर या वीडियो का संदर्भ देखना, तारीख जांचना और दावे को विश्वसनीय स्रोत से मिलाना डिजिटल नागरिकता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सोशल मीडिया पर ‘पहले जांचें, फिर साझा करें’ जैसी आदत भी गलत सूचना के प्रसार को रोकने में मदद कर सकती है। चौंकाने वाले संदेश को तुरंत साझा करने के बजाय उसकी पुष्टि करना जरूरी है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नियमन में संतुलन

फर्जी खबरों पर रोक लगाने वाली किसी भी व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल महत्वपूर्ण रहेगा। गलत सूचना से मुकाबला जरूरी है, लेकिन वैध आलोचना, पत्रकारिता, व्यंग्य और असहमति को गलत तरीके से प्रतिबंधित नहीं किया जाना चाहिए।

संसदीय समिति ने भी फर्जी खबर की परिभाषा तैयार करते समय संविधान में दिए अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ध्यान में रखने की बात कही है। इसलिए भविष्य की व्यवस्था स्पष्ट नियमों, उचित प्रक्रिया और जवाबदेही पर आधारित होना जरूरी होगा।

आगे क्या होगा

अब नजर उन तीन मुद्दों पर रहेगी जिन पर केंद्र ने अंतिम जवाब नहीं दिया है। इन पर आगे की नीति तय होने के बाद नियमन का स्वरूप अधिक स्पष्ट हो सकता है।

बाकी 9 सिफारिशों की स्वीकृति से संकेत मिलता है कि सरकार फर्जी खबरों से निपटने के लिए बहुस्तरीय व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। तकनीक, शिकायत निवारण, मीडिया साक्षरता, डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और सहयोग इसके महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं।

निष्कर्ष

केंद्र द्वारा समिति की 12 में से 9 सिफारिशों को स्वीकार करना फर्जी खबरों के खिलाफ महत्वपूर्ण कदम है। वहीं तीन प्रमुख मुद्दों पर जवाब लंबित रहने से साफ है कि कई कानूनी और नीतिगत सवाल अभी विचाराधीन हैं।

फर्जी खबरों की चुनौती तकनीक के साथ बदल रही है। सोशल मीडिया और AI ने सूचना के प्रसार को आसान बनाया है, लेकिन गलत जानकारी का खतरा भी बढ़ा है। मजबूत फैक्ट-चेकिंग, पारदर्शी शिकायत प्रणाली, जिम्मेदार डिजिटल प्लेटफॉर्म और मीडिया साक्षरता जरूरी हैं।

सबसे बड़ी चुनौती प्रभावी नियंत्रण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में संतुलन कायम करना होगी। यदि आगे की व्यवस्था स्पष्ट नियमों, निष्पक्ष प्रक्रिया और पारदर्शिता पर आधारित होती है, तो इससे डिजिटल सूचना तंत्र में जनता का भरोसा मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

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लेखक: क्रिष्णा पटेल

प्रकाशित: 8 August 2026
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