प्रमोद कुमार
भारत की स्वतंत्रता, औपनिवेशिक प्रतीकों से मुक्ति के साथ-साथ औपनिवेशिक सोच से मुक्ति अतीत का निषेध नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता के आत्मविश्वास के साथ उसका पुनर्पाठ और सत्ता की मानसिकता से सेवा की मानसिकता की ओर निरंतर बढ़ते कदमों की द्योतक है ….
स्वतंत्रता केवल सत्ता के हस्तांतरण का नाम नहीं है। वास्तविक स्वतंत्रता तब मानी जाती है, जब किसी राष्ट्र का शासन, उसकी संस्थाएँ, उसकी भाषा, उसके प्रतीक, उसकी न्याय-व्यवस्था और उसकी सार्वजनिक चेतना भी अपनी सभ्यता और अपने आत्मबोध के अनुरूप दिखाई देने लगें। भारत ने 15 अगस्त 1947 को राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता के अमृतकाल में यह प्रश्न उठाया कि क्या देश वास्तव में औपनिवेशिक मानसिकता और उसके प्रतीकों से भी मुक्त हो पाया है?
15 अगस्त 2022 को लाल किले से प्रधानमंत्री ने ‘पंच प्रण’ का आह्वान करते हुए ‘गुलामी की मानसिकता से पूरी तरह मुक्ति’ और ‘विरासत पर गर्व’ को राष्ट्र के प्रमुख संकल्पों में रखा। इसके बाद पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक स्थलों, सरकारी भवनों, संस्थागत नामों, सैन्य प्रतीकों, कानूनों और प्रशासनिक ढाँचे में ऐसे अनेक परिवर्तन हुए हैं, जिन्हें सरकार इस व्यापक अभियान का हिस्सा मानती है। जनवरी 2026 के सरकारी प्रकाशन ने भी इसे भारत की पहचान के पुनर्स्मरण और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की एक निरंतर यात्रा बताया है।
यहाँ एक तथ्यात्मक सावधानी आवश्यक है। सरकार ने अब तक ‘गुलामी के सभी चिन्ह हटाने’ के नाम पर किए गए हर परिवर्तन की कोई एक आधिकारिक, अंतिम और संपूर्ण संख्या जारी नहीं की है। इसलिए ‘कुल इतने स्थान’ कहना भ्रामक होगा। उपलब्ध सरकारी अभिलेखों को जोड़ने पर कम-से-कम दो दर्जन से अधिक प्रमुख स्थानों/स्थलों के नाम या प्रतीकात्मक पहचान में परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, जबकि नीतिगत और संस्थागत स्तर पर इसका दायरा इससे कहीं व्यापक है।
नाम बदले, पहचान बदली-
गुलामी की मानसिकता से सदैव बनी रहे इसके लिए बाहरी शासकों द्वारा स्थानों के नामकरण करके हमेशा हमें उसी समय की मानसिकता में रखने का कुचक्र बनाया I अतः अब देश में विभिन्न स्थानों के नाम बदल कर जैसे दिल्ली का रेस कोर्स रोड का नाम बदल 2016 में लोक कल्याण मार्ग रख दिया गया । यह केवल सड़क के नाम का परिवर्तन नहीं था I सरकार ने इसे सत्ता-केंद्रित औपनिवेशिक मानसिकता से ‘लोककल्याण और सेवा’ की ओर बदलाव के रूप में प्रस्तुत किया।
इसके बाद डलहौजी रोड का नाम दारा शिकोह रोड रखा गया। इससे पहले औरंगजेब रोड का नाम डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम आजाद रोड किया गया ।
वर्ष 2018 में तीन मूर्ति चौक का नाम तीन मूर्ति हाईफा चौक कर दिया गया। यह परिवर्तन भारतीय सैनिकों के प्रथम विश्वयुद्ध में हाइफा की लड़ाई में योगदान को स्मरण करने की दृष्टि से किया गया था। सरकारी प्रकाशन ने इन सभी परिवर्तनों को ऐसे स्थानों की पहचान बदलने की प्रक्रिया का हिस्सा बताया है, जिनके नाम औपनिवेशिक या विदेशी सत्ता की स्मृति से जुड़े थे।
सबसे चर्चित परिवर्तन 2022 में हुआ, जब ब्रिटिश काल के नामकरण राजपथ/किंग्जवे को कर्त्तव्य पथ नाम दिया गया। प्रधानमंत्री ने स्वयं कहा था कि राजपथ औपनिवेशिक सत्ता का प्रतीक था और उसका नया नाम लोकतांत्रिक भारत में नागरिकों के कर्तव्य और जनभागीदारी का संदेश देता है। उसी अवसर पर इंडिया गेट के निकट ब्रिटिश सम्राट जोर्ज वी की प्रतिमा के स्थान पर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई।
अंदमान में औपनिवेशिक स्मृतियों का पुनर्लेखन
इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण अंदमान-निकोबार द्वीपसमूह के नाम कारण किये जाना भी रहा I वर्ष 2018 में रोज आयरलैंड का नाम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस आयरलैंड, हैवलॉकयल आयरलैंड का नाम स्वराज द्वीप और नेल आयरलैंड का नाम शहीद द्वीप किया गया। सरकार ने इसे नेताजी और आजाद हिंद सरकार की स्मृति से जोड़ते हुए प्रस्तुत किया। इसके अतिरिक्त जनवरी 2023 में अंडमान-निकोबार के 21 सबसे बड़े अनाम द्वीपों के नाम 21 परमवीर चक्र विजेताओं के नाम पर रखे गए। इस प्रकार केवल इस एक पहल में 21 नए राष्ट्रीय स्मृति-स्थल तैयार हुए।
यदि तीन प्रमुख द्वीपों के पूर्व नामों और 21 परमवीर चक्र विजेताओं के नाम वाले द्वीपों को अलग-अलग गिना जाए, तो अंडमान-निकोबार में 24 द्वीपों की पहचान इस प्रक्रिया से सीधे जुड़ गयी । जो अब भारतीय शौर्य की पहचान बन गए हैं I
राष्ट्रपति भवन भी नहीं छूटा
राष्ट्रपति भवन भी इस बदलाव से अछूता नहीं रहा। 2024 में दरबार हॉल का नाम गणतंत्र मंडप और अशोक हॉल का नाम अशोक मंडप किया गया। राष्ट्रपति सचिवालय ने स्पष्ट किया कि ‘दरबार’ शब्द औपनिवेशिक तथा राजशाही संदर्भों से जुड़ा था, जबकि ‘गणतंत्र’ भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा और गणतांत्रिक चेतना को अधिक उपयुक्त ढंग से व्यक्त करता है। अशोक मंडप नाम में भारतीय इतिहास, सम्राट अशोक और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का संदर्भ जोड़ा गया। इसी परिसर के मुगल गार्डन का नाम बदलकर अमृत उद्यान किया गया। यह परिवर्तन भी राष्ट्रपति भवन की पहचान को भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ से जोड़ने की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा कहा जा रहा है ।
संसद में ‘सेंगोल’: सत्ता से सेवा तक का प्रतीक
नए संसद भवन में सेंगोल की स्थापना इस अभियान का अत्यंत महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और सभ्यतागत प्रतीक बनी।
सरकार के अनुसार सेंगोल को 1947 में सत्ता हस्तांतरण के अवसर से जोड़ा जाता है और इसे चोल परंपरा में न्याय, कर्तव्य तथा धर्मसम्मत शासन के प्रतीक के रूप में देखा गया। प्रधानमंत्री ने इसे नए संसद भवन में स्थापित कर लोकतंत्र की आधुनिक संस्था को भारतीय ऐतिहासिक परंपरा से जोड़ने का प्रयास किया। इसी क्रम में पुराने संसद भवन को बाद में संविधान सदन नाम दिया गया। इस वर्ष प्रधानमंत्री ने स्वयं कहा कि पुरानी संसद को केवल पीछे छोड़ने के बजाय उसे भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाएगा।
प्रशासनिक वास्तुकला में नया संदेश
2026 में यह प्रक्रिया एक नए चरण में पहुँची। पुराने नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लाक के स्थान पर नए प्रशासनिक परिसर के रूप में सेवा तीर्थ और कर्त्तव्य भवन-1 एवं 2 विकसित किए गए।
प्रधानमंत्री कार्यालय को ‘सेवा तीर्थ’ नाम देना प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘राज’ और ‘सत्ता’ की जगह ‘सेवा’ को प्रशासन का मूल भाव बनाने का संदेश दिया गया। ‘सेवा तीर्थ’ में प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् सचिवालय और मंत्रिपरिषद सचिवालय को एकीकृत किया गया, जबकि कर्तव्य भवन में अनेक केंद्रीय मंत्रालयों को समेकित किया गया। पुराने नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लाक को नष्ट करने के बजाय उन्हें युगे युगीन भारत संग्रहालय के हिस्से के रूप में संरक्षित करने की योजना भी इसी दृष्टिकोण को दर्शाती है, इतिहास को मिटाना नहीं, बल्कि उसके अर्थ को भारतीय दृष्टि से पुनर्पाठ करना।
सैन्य प्रतीकों में भारतीयता
औपनिवेशिक प्रतीकों से मुक्ति का एक महत्वपूर्ण अध्याय भारतीय नौसेना के ध्वज में परिवर्तन भी रहा । वर्ष 2022 में भारतीय नौसेना ने नया प्रतीक अपनाया, जिसमें औपनिवेशिक सेंट जॉर्ज क्रॉस को हटाकर भारतीय समुद्री परंपरा और छत्रपति शिवाजी महाराज की विरासत से प्रेरित प्रतीक को स्थान दिया गया। सरकार इसे औपनिवेशिक सैन्य विरासत से मुक्ति का महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसी प्रकार 2022 में पहली बार स्वदेशी एटीएजीएस तोप से स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 21 तोपों की सलामी दी गई। यह केवल सैन्य तकनीक का प्रश्न नहीं कहा जा सकता, अपितु स्वदेशी रक्षा क्षमता को राष्ट्रीय समारोह की पहचान से जोड़ने का प्रतीक कहा जा सकता है ।
कानूनों में सबसे बड़ा परिवर्तन
हम स्थानों और प्रतीकों का परिवर्तन बाहरी पहचान का परिवर्तन कह सकते हैं, तो 2024 में लागू हुए तीन नए आपराधिक कानून इस पूरी प्रक्रिया का सबसे गहरा नीतिगत परिवर्तन कहा जा रहा है।
भारतीय दंड संहिता, 1860, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 को क्रमशः भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम ने प्रतिस्थापित किया। ये तीनों कानून 1 जुलाई 2024 से लागू कर दिए गए हैं।
सरकार ने इसे औपनिवेशिक दौर के आपराधिक कानूनों से मुक्ति के रूप में परिभाषित किया है। नए कानूनों में आतंकवाद और संगठित अपराध की स्पष्ट परिभाषा, डिजिटल साक्ष्य, फॉरेंसिक जांच और नागरिक-केंद्रित न्याय जैसे कई आधुनिक प्रावधान शामिल किये जाने से भी सरकार ने स्पस्ट किया है कि यहाँ भी परतंत्रता के चिन्ह हटा रहा है भारत ।
इसके अतिरिक्त सरकार की माने तो देश में 1,500 से अधिक अप्रासंगिक/पुराने कानूनों को निरस्त किया जा चुका है। यह परिवर्तन केवल नाम बदलने से कहीं अधिक गहरा है, क्योंकि कानून किसी भी शासन-व्यवस्था की मानसिकता और प्राथमिकताओं को निर्धारित करते हैं।
वीआईपी संस्कृति से नागरिक
2017 में लाल बत्ती संस्कृति समाप्त करना भी इस विमर्श का हिस्सा बनता दिख रहा है । केंद्र सरकार ने सभी प्रकार के वाहनों पर लाल अथवा अन्य रंग की बीकन लाइट समाप्त करने का निर्णय लिया। प्रधानमंत्री ने इसे इस विचार से जोड़ा कि लोकतंत्र में ‘हर भारतीय विशेष है’, न कि केवल सत्ता में बैठा व्यक्ति, यह सन्देश सरकार दे रही है।
2016 में रेलवे बजट को जनरल बजट में मिलाना और बजट प्रस्तुत करने की तारीख को आगे करना भी प्रशासनिक औपनिवेशिक परंपराओं से अलग होने की दिशा में उठाए गए कदमों के रूप में प्रस्तुत किया गया। रेलवे बजट की अलग व्यवस्था 1924 से चली आ रही थी। 2019 में वित्त मंत्री द्वारा बजट पेश करते समय पारंपरिक ब्रीफकेश की जगह बही-खाते का प्रयोग भी इसी सांस्कृतिक विमर्श का प्रतीक बना।
स्मृति के केंद्र भी बदले
औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति केवल पुराने नाम हटाने की प्रक्रिया नहीं है; यह इस बात से भी जुड़ी है कि स्वतंत्र भारत किसे याद करता है। 2019 में राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का निर्माण स्वतंत्रता के बाद शहीद हुए सैनिकों के सम्मान में हुआ। इससे पहले राष्ट्रीय राजधानी में स्वतंत्र भारत के युद्ध शहीदों के लिए ऐसा समर्पित राष्ट्रीय स्मारक नहीं था। 2018 में राष्ट्रीय पुलिस स्मारक बनाया गया, जिसमें स्वतंत्रता के बाद कर्तव्य निभाते हुए बलिदान देने वाले पुलिसकर्मियों की स्मृति को स्थान दिया जाना भी लोगों में चर्चा का विषय बना हुआ है ।
यह प्रक्रिया केवल ‘किसी अंग्रेज का नाम हटाकर किसी भारतीय का नाम रखने’ तक सीमित नहीं है। यह उस राष्ट्रीय स्मृति को पुनर्संतुलित करने का प्रयास है जिसमें स्वतंत्र भारत के सैनिक, पुलिसकर्मी, स्वतंत्रता सेनानी, वैज्ञानिक, सामाजिक नायक और सांस्कृतिक परंपराएँ अधिक प्रमुख हों।
नाम बदलने से आगे की यात्रा
प्रधानमंत्री के ‘गुलामी की मानसिकता से मुक्ति’ के आह्वान का वास्तविक मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितने सड़कों या भवनों के नाम बदले गए। किसी भी राष्ट्र की मानसिक स्वतंत्रता तीन स्तरों पर दिखाई देती है, वह अपने अतीत को कैसे देखता है, वर्तमान संस्थाओं को किस मूल्य पर चलाता है और भविष्य की कल्पना किस आत्मविश्वास से करता है।
राजपथ का कर्तव्य पथ होना, जॉर्ज वी की जगह नेताजी की प्रतिमा का आना, अंडमान के द्वीपों का नामकरण, नौसेना के ध्वज में भारतीय प्रतीक का आना, राष्ट्रपति भवन की शब्दावली का भारतीयकरण, संसद में सेंगोल की स्थापना, पुराने औपनिवेशिक आपराधिक कानूनों की जगह भारतीय नामों और नए प्रावधानों वाले कानूनों का आना तथा प्रशासनिक परिसर का ‘सेवा’ और ‘कर्त्तव्य’ की अवधारणा से जुड़ना, इन सबको एक साथ देखें तो यह केवल नाम परिवर्तन की श्रृंखला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मबोध के पुनर्निर्माण का प्रयास दिखाई देता है।
देश में इस यात्रा की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में भारतीयता केवल भवनों, नामों और प्रतीकों तक सीमित न रखते हुए । ‘सेवा’ नाम के भवन में शासन नागरिक के प्रति संवेदनशील हो, ‘कर्तव्य’ केवल शब्द न रहकर प्रशासन की कार्यशैली बने, ‘गणतंत्र’ केवल भवन का नाम नहीं बल्कि लोकतांत्रिक आचरण बने और ‘न्याय’ केवल कानून का शीर्षक नहीं बल्कि आम नागरिक का अनुभव बने, तभी ‘गुलामी की मानसिकता से मुक्ति’ का संकल्प वास्तविक अर्थ में भारत प्राप्त करेगा ।
भारत की स्वतंत्रता औपनिवेशिक प्रतीकों से मुक्ति के साथ-साथ औपनिवेशिक सोच से मुक्ति; अतीत का निषेध नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता के आत्मविश्वास के साथ उसका पुनर्पाठ; और सत्ता की मानसिकता से सेवा की मानसिकता की ओर निरंतर यात्रा।
यह यात्रा एक ऐसे भारत की आधारभूमि बनती दिख रही है, जहां आधुनिक भी हो और अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ भी, वैश्विक भी हो और अपनी पहचान को लेकर आत्मविश्वासी भी, तथा विकसित भी हो और अपनी सभ्यता के प्रति गौरवान्वित महसूस करें ।
राज्य भी पीछे नहीं
उत्तर प्रदेश
इलाहाबाद का प्रयागराज, फैजाबाद का अयोध्या; मुगलसराय स्टेशन का नाम पं. दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन, झांसी स्टेशन का वीरांगना लक्ष्मीबाई, 8 और रेलवे स्टेशनों के नाम भारतीय/धार्मिक-सांस्कृतिक नामों पर किए गए।
महाराष्ट्र
औरंगाबाद का छत्रपति संभाजीनगर, उस्मानाबाद का धाराशिव, मुंबई के ब्रिटिशकालीन नाम वाले 8 उपनगरीय रेलवे स्टेशनों के नाम बदल दिए गए जैसे कैरी रोड का लालबाग, मरीन लाइन का मुम्बादेवी, चरनी रोड का गिरगांव, मुंबई सेन्ट्रल का नाना जगन्नाथ शंकरशेठ।
तेलंगाना
सिकंदराबाद कैंटोनमेंट में 2026 में 21 ब्रिटिशकालीन सड़कों और 4 बाजार क्षेत्रों के नाम भारतीय सैन्य नायकों, स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रनायकों के नाम पर नामकरण किया जाना ।
उत्तराखंड
देहरादून के राजभवन को आधिकारिक रूप से “लोक भवन” किया गया अब नैनीताल राजभवन को भी इसी जन-केंद्रित नाम से संबोधित किया जा रहा है।
कर्नाटक
ब्रिटिश अधिकारियों के नाम पर बने सार्वजनिक संस्थानों/अस्पतालों और सड़कों के नाम बदले गए, जैसे बोरिंग,लेडी कर्जन,मिन्टो और विक्टोरिया जैसे ब्रिटिश नामों को स्वतंत्रता सेनानियों के नाम से बदलने का प्रस्ताव विचारधीन है। एवं कर्नाटक रक्षा प्रतिष्ठानों में 17 नाम परिवर्तन दर्ज हैं।
पश्चिम बंगाल
सेना के ब्रिटिशकालीन प्रतिष्ठानों के नामों में बड़ा परिवर्तन हुआ। जैसे फोर्ट विलियम की जगह विजय दुर्ग, जॉर्ज गेट की जगह शिवाजी द्वार, किचनर हाउस की जगह फील्ड मार्शल मानेकशा भवन, डलहौजी बैरेक्स की जगह नेताजी बैरेक्स कर दिया गया ।
हरियाणा
अंबाला कैंटोनमेंट सहित सैन्य प्रतिष्ठानों में ब्रिटिशकालीन नाम हटाकर भारतीय सैनिकों/वीरों के नाम किए गए। सरकारी आकड़ों की माने तो हरियाणा में 40 सैन्य सुविधाओं के नाम परिवर्तन दर्ज हैं।
मध्य प्रदेश
मऊ/महू जैसे सैन्य क्षेत्रों सहित रक्षा प्रतिष्ठानों में ब्रिटिशकालीन नामों का परिवर्तन किया गया एवं 18 सैन्य सुविधाओं के नाम बदले गए।
राजस्थान
जयपुर कैंटोनमेंट समेत सैन्य प्रतिष्ठानों में नाम बदलकर कुल 9 सैन्य सुविधाएँ पुनर्नामित की गयीं ।
पंजाब
कुल 8 सैन्य प्रतिष्ठानों के नाम परिवर्तित किये गए ।
नागालैंड
4 सैन्य प्रतिष्ठानों के नाम परिवर्तन किये गए।
हिमाचल प्रदेश
03 सैन्य प्रतिष्ठानों के नामों को परिवर्तित किया जा चुका है ।
केरल
2 सैन्य प्रतिष्ठानों के नाम परिवर्तित किये गए।
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