महाराणा प्रताप ने मुगलों के खिलाफ संघर्ष के दौरान मेवाड़ की स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए जनभागीदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी थी। उन्होंने न केवल सैनिकों, बल्कि आम जनता (भील जनजाति सहित) को साथ लेकर युद्ध लड़ने का साहसिक कार्य किया ।
सबको जोड़ा
राजशाही के समय में जनभागीदारी सुनिश्चित कर न केवल अपनी जनता का भरोसा जीता अपितु उन्हें भावनात्मक रूप से अपनी माटी की सेवा करने हेतु अवसर प्रदान किया I प्रताप ने जनता को विश्वास में लिया और उन्हें आत्मनिर्भरता व स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने हेतु प्रेरित किया I मेवाड़ के भील समुदाय ने महाराणा प्रताप को अपना पूरा समर्थन दिया और गुरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) में सक्रिय भूमिका निभाई। मेवाड़ के मंत्री भामाशाह ने अपनी व्यक्तिगत संपत्ति देश के लिए समर्पित कर दी, जिससे प्रताप को अपनी सेना को पुनर्गठित करने और जन-सहयोग से युद्ध जारी रखने में मदद मिली। उन्होंने अपने राज्य में कृषि, स्थानीय उद्योगों और व्यापार को बढ़ावा दिया, ताकि जनता विदेशी ताकतों के सामने झुकने के बजाय आत्मनिर्भर बन सके। चावंड में अपनी राजधानी स्थापित करने के बाद, उन्होंने कवियों, कलाकारों और विद्वानों को आश्रय दिया, जिससे लोगों में सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत हुई।
उस कालखंड में महाराणा प्रताप का संघर्ष केवल युद्ध का नहीं, अपितु जन-सहयोग का एक अनुपम उदाहरण कहा जा सकता है । उन्होंने अपनी “नेतृत्व क्षमता” के बल पर आम जनता को “स्वाभिमान” की रक्षा के लिए एकजुट करने का साहस किया और उसमें वो सफल भी हुए ।
हल्दी घटी युद्ध से सीख
जून 1576 ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुए भीषण युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप कर रहे थे। भील सेना के सरदार, पानरवा के ठाकुर राणा पूंजा सोलंकी थे। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की ओर से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे हकीम खाँ सूरी।
लड़ाई का स्थल राजस्थान के गोगुन्दा के पास हल्दीघाटी में एक संकरा पहाड़ी दर्रा था। महाराणा प्रताप ने लगभग 3,000 घुड़सवारों और 400 भील धनुर्धारियों के बल को मैदान में उतारा। मुगलों को ओर से आमेर के राजा मान सिंह ने नेतृत्व किया, 5 से 10 हजार लोगों की सेना को लेकर युद्ध क्षेत्र में उतरने वाले मान सिंह । तीन घण्टे से अधिक समय तक चले भयंकर युद्ध के बाद, महाराणा प्रताप ने खुद को जख्मी पाया जबकि उनके कुछ लोगों ने उन्हें समय दिया, वे पहाड़ियों से भागने में सफल रहे और एक और दिन लड़ने के लिए जीवित रहे। मेवाड़ के हताहतों की संख्या लगभग 1,600 पुरुषों की थी। मुगल सेना ने 3500-7800 लोगों को खो दिया, जिसमें 350 अन्य घायल हो गए। इस युद्ध में मेवाड़ के महाराणा प्रताप विजय हुए I इतनी बड़ी सेना के समक्ष जीतना निश्चित रूप से महाराणा के पराक्रम, कुशल युद्ध नीति का परिचायक था, किन्तु इस युद्ध में महाराणा ने यह भली तरह समझ लिया था,कि जनता का सहभाग करवाना होगा I
महाराणा प्रताप ने मुगलों के खिलाफ युद्ध में स्थानीय जनता, विशेषकर भील जनजाति का सहयोग लेकर एक अद्वितीय सैन्य रणनीति बनाई थी। उन्होंने आदिवासियों को केवल सैनिक नहीं, बल्कि अपना अभिन्न अंग और ‘परिवार’ माना, जिससे उन्हें अभूतपूर्व निष्ठा प्राप्त हुई।
स्थानीय जनता और भीलों की निर्णायक भूमिका
महाराणा ने भीलों को ससम्मान अपनी सेना में उच्च पदों पर आसीन किया, जैसे भील जनजाति के राणा पूंजा को अपनी सेना में महत्वपूर्ण स्थान दिया और उन्हें ‘भील सेना नायक’ की उपाधि से सम्मानित किया, जिससे भीलों का मनोबल बढ़ा और वे पूरी शक्ति से प्रताप के साथ खड़े रहे।
भील तीरंदाज अरावली की पहाड़ियों और जंगलों में छिपकर अचानक हमला करने (छापामार युद्ध) में पारंगत थे। उन्होंने मुगलों की रसद लाइनें काट दीं और उन पर अचानक हमला कर गुरिल्ला युद्ध के माध्यम से उन्हें अटका कर रखा । स्थानीय भील जनजाति ने गुप्तचर के रूप में सदुपयोग किया। भील विभिन्न प्रकार से ढोल बजाकर अथवा आवाज के संकेतों से एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी तक गुप्त संदेश पहुँचाने का कार्य करते थे, जिससे प्रताप को मुगल सेना की हर हलचल की खबर रहती थी।
जब प्रताप को हल्दीघाटी के बाद जंगलों में रहना पड़ा, तब भील आदिवासियों ने उन्हें न केवल आसरा दिया, अपितु कंद-मूल और जंगली फल खिलाकर उनकी रक्षा की I प्रताप ने आदिवासियों के साथ मिलकर जीवन व्यतीत किया और कठिनाइयाँ सही। उनके इस अपनत्व के कारण भील उन्हें आदर से “कीका” (पुत्र) कहते थे।
इन स्थानीय सहयोगियों के कारण, मुगलों के पास विशाल सेना होने के बावजूद वे मेवाड़ को पूरी तरह से अधीन नहीं कर सके और महाराणा प्रताप ने गोरिल्ला रणनीति से अपने कई क्षेत्रों को पुनः प्राप्त कर लिया।
लेखक- प्रमोद कुमार
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