परिचय
जीवन में हमारी हर कदम पर परीक्षा होती है, अधिकतम हम अपनी अपेक्षाओं पर कम दूसरों की अपेक्षाओं के लिए जी रहे होते हैं, इसमें कोई बुरी बात नहीं, किन्तु हम अपनी और पराई अपेक्षाओं में संतुलन न बना पाने, अपने आप में लोगों को डील करने के कौशल्य को न विकसित करने के कारण, हम अपना बहुमूल्य अधिकतम समय नष्ट कर रहे होते हैं न मात्र समय,अपितु अपनी ऊर्जा, अपनी आत्मिक शक्ति सब झोंक देते हैं इस सब में अपने आपसे की जाने वाली अपेक्षाओं को व्यक्ती पूर्ण नहीं कर पाता, जिसके कारण और कोई नहीं वही सफर करता है, क्या आप भी जिंदगी के उत्तरार्द्ध में ठगा सा महसूस करना चाहते हैं l यदि नहीं तो अपनी अपेक्षाओं पर काम करो
अपेक्षाएं अपराध नहीं
स्मरण रहे मैंने अपेक्षाएं कहा है, मतलब अप-इच्छा, अपनी इच्छा और जब आप अपनी इच्छा के अनुसार अपनी कामयाबी के तय करेंगे तो आप स्वेच्छा से अपने आप का आंकलन करते हुए, अपने सामर्थ्य का, प्रतिभा योग्यता के आधार पर अपेक्षायें करेंगे. यह भी याद रहे अपेक्षायें मतलब किसी का क्षय करके प्राप्त करने वाली इच्छायें नहीं होती, वह स्वयं के मतानुकूल, अपने भाव से अपनी प्रगति और अपने आसपास वालों के कल्याण हेतु की गई इच्छायें ही अपेक्षायें हैं, इसलिए यह अपराध नहीं अपितु आपकी अभिलाषाएं हैं l जिसमें आपकी आशाओं में भगवान द्वारा उनकी कृपा, आपका सामर्थ्य, परिश्रम, अपनी गति प्रगति निहित होती है l
अपेक्षा का संतुलन
हम इसे आसान भाषा में समझने का प्रयास करेंगे, जैसे हम जो दूसरों से अपेक्षा करते हैं, वो सदैव दुखदायी होती हैं, क्योंकि सब आपके नहीं हैं, अथवा सब अपने अनुसार नहीं चल सकते या ये कहें आप सभी प्राथमिकता में हों यह जरूरी नहीं. कोई आपसे किस उद्देश्य से जुड़ा है यह आपको भी नहीं पता होता है कई बार, इसलिए किसी से आवश्यक अथवा व्यवहारिक अपेक्षाओं के अतिरिक्त अपेक्षा करने से बचें अथवा न ही करें तो आप सहज रहेंगे l
दूसरा आप जब अपने आप से अपेक्षाएं करते हैं तो भी आपको सावधानी रखनी होगी, अपने सामर्थ्य और व्यवहारिकता समझते हुए ही अपने आप से अपेक्षाएं करनी चाहिएं, अपने आप से भी एक सीमा रेखा से आगे की अपेक्षायें रखना भी आपके मन की शांति और आपका आनंद छीन सकता है l आपके मूल मार्ग से भटका सकता है l बड़ा सोचें लेकिन व्यवहारिक सोचें, अपनी रुचि और स्वभाव के अनुसार सोचें, अपने सामर्थ्य के अनुरूप सोचें तभी आपको अपेक्षित सफलता मिल सकेगी, वही आपकी सच्ची संतुष्टि होगी, यही आपका संतुलन होगा और यही संतुलन आपको योग्य सफलता प्रदान करेगा l
अपेक्षाओं का बाजार
ये सम्पूर्ण संसार अपेक्षाओं का बाजार ही तो है, यहां कोई अछूता नहीं, सब बाजार में ग्राहक हैं, बस कीमत नहीं देना चाहते, थोड़े चालाक ग्राहक हैं l कोई बात नहीं आप बस एक काम करें उन्हेंं समझाने की बजाय स्वयं को चतुर बनाओ, मत फंसो भंवर में l जैसे हम किसी भी बाजार में जाते समय उस बाजार की प्रकृति जान कर ही उस बाजार में व्यवहार और खरीदारी करते हैं ऐसे ही जीवन है l आप सहज रहने के लिए अच्छे पर्यटक बनें, न ज्यादा बड़े खरीदार और न ज्यादा बड़े व्यापारी, अपने में स्वभाव सबका विकसित करें, किन्तु हावी न होने दें, उसी के साथ खड़े हों जो अपना हो, जो आपको मानता हो, जिसकी प्राथमिकता आप हों, अन्यथा आप अपनी प्राथमिकता स्वयं को बनाएं l
दुःख का मूल अपेक्षाएं
जो आसान है वही दुखदायी है, अर्थात किसी से भी अपेक्षाएं करना सहसा व्यक्ति को अच्छा लगता है, क्योंकि उसमें आपको स्वयं परिश्रम नहीं करना, स्वयं का करने का उसमें कुछ है नहीं, सिवाय अपने सम्बन्ध की कीमत करने जैसा कुछ सोचना हैI आपको जो चाहिए उसके हिसाब से आप अपने संबंधों में पात्र तलाशते हैं और फिर उससे अपेक्षा रखते हुए, बहुत ही चतुराई से अपनी मांग रखते हैं, जिसमें आप अपने अपने आपसे भी सामने वाले से भी चोरी कर रहे है होते हैं I समझ आप भी रहे होते हैं समझ सामने वाला भी रहा होता है, लेकिन अज्ञानता वश आप अपनी मांग पर डेट रहते हैं I अब परिणाम क्या होगा या तो मांग पूरी होगी या तो नहीं होगी ? दोनों परिस्थितियों में आपको नुकसान है, आपक काम हो गया तो आपकी चतुराई, अकर्मंत्यता और आपका अहंकार पुष्ट हुआ और नहीं होई तो आपको जलन, ईर्ष्या, झुंझलाहट ने घेर लिया होता है I इसलिए अपेक्षाएं हर प्रकार से आपको दुःख ही देती हैं, यही आपके दुखों का कारण होती हैं I

