इस बार बप्पा को घर लाने से पहले जानें Eco-Friendly गणपति के ये 5 बड़े फायदे-
गणेश चतुर्थी का त्योहार देश भर में बड़े ही धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। ढोल-नगाड़ों की थाप, “गणपति बाप्पा मोरया” के जयकारे और घर-घर में गूंजती आरती का माहौल हर दिल में एक नई उमंग भर देता है। हर साल भक्त अपने विघ्नहर्ता को घर लाने और उनकी सेवा करने के लिए महीनों पहले से तैयारियां शुरू कर देते हैं। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि बप्पा की पूजा के दौरान हमारी अनजाने में की गई कुछ गलतियां हमारी प्रकृति को कितना नुकसान पहुंचाती हैं?
पारंपरिक रूप से गणेश जी की मूर्तियां मिट्टी से बनाई जाती थीं, जो पानी में आसानी से घुल जाती थीं। हालांकि, समय के साथ प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) और रासायनिक रंगों से बनी मूर्तियों का चलन बढ़ गया। इसके परिणामस्वरूप, विसर्जन के बाद हमारी नदियां और तालाब प्रदूषित होने लगे। इसलिए, इस गणेश चतुर्थी अगर आप भी अपने घर विघ्नहर्ता का स्वागत करने जा रहे हैं, तो पर्यावरण-अनुकूल यानी Eco-Friendly Ganpati लाने पर विचार करें।
आओ जानते हैं कि इस बार इको-फ्रेंडली गणपति लाने के 5 सबसे बड़े फायदे क्या हैं और यह कदम क्यों जरूरी है।
- जल प्रदूषण से जलचरों और नदियों की सुरक्षा
पारंपरिक प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) की मूर्तियां पानी में आसानी से नहीं घुलती हैं। इसके अलावा, इन्हें तैयार करने में जो केमिकल वाले जहरीले रंगों (जैसे लेड, क्रोमियम, मर्करी) का इस्तेमाल होता है, वे पानी को पूरी तरह जहरीला बना देते हैं।
प्रकृति की रक्षा: जब हम पीओपी की मूर्तियों का विसर्जन नदियों, तालाबों या समुद्र में करते हैं, तो पानी में ऑक्सीजन का स्तर घटने लगता है।
जलचरों की सुरक्षा: इसके परिणामस्वरूप, मछली और अन्य जलीय जीवों की मौत होने लगती है।
इको-फ्रेंडली का फायदा: इसके विपरीत, इको-फ्रेंडली गणपति शुद्ध मिट्टी, मुल्तानी मिट्टी या गोबर से बनाए जाते हैं। ये पानी में मिनटों में घुल जाते हैं और जल को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।
- ‘ट्री गणेशा’ (Tree Ganesha) से पर्यावरण को नया जीवन
आजकल इको-फ्रेंडली गणेश मूर्तियों में ‘ट्री गणेशा’ का कॉन्सेप्ट काफी ट्रेंड में है। इसके तहत मूर्ति के अंदर मिट्टी के साथ-साथ पौधों के बीज (जैसे तुलसी, टमाटर, या गेंदा) मिला दिए जाते हैं।
घर पर ही विसर्जन: त्योहार पूरा होने के बाद आपको विसर्जन के लिए किसी नदी या तालाब पर जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
प्रकृति को उपहार: आप अपने घर के गमले या बगीचे में ही मूर्ति का विसर्जन कर सकते हैं।
नया जीवन: कुछ ही दिनों में उस मिट्टी से एक सुंदर पौधा निकल आता है। नतीजतन, बप्पा मूर्ति के रूप में विसर्जित होकर भी एक पौधे के रूप में हमेशा आपके घर में मौजूद रहते हैं।
- मानव स्वास्थ्य पर हानिकारक रसायनों का असर नहीं
पीओपी मूर्तियों पर इस्तेमाल होने वाले सिंथेटिक रंग न केवल पानी को खराब करते हैं, बल्कि वे पानी के जरिए अंततः हमारी फ़ूड चेन (Food Chain) में भी प्रवेश कर जाते हैं।
स्वास्थ्य के लिए जोखिम: दूषित पानी से फसलें और नदियां प्रभावित होती हैं, जिससे कैंसर, त्वचा रोग और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ता है।
प्राकृतिक रंगों का जादू: इको-फ्रेंडली मूर्तियां बनाने के लिए हल्दी, गेरू, कुमकुम, चंदन और प्राकृतिक वनस्पति रंगों का इस्तेमाल किया जाता है।
सुरक्षित वातावरण: इसलिए, इन्हें छूने या घर में रखने से बच्चों और परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है।
- स्थानीय कारीगरों (Local Artisans) और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा
जब आप हस्तनिर्मित मिट्टी की इको-फ्रेंडली मूर्ति खरीदते हैं, तो इसका सीधा फायदा हमारे देश के पारंपरिक मूर्तिकारों और छोटे कारीगरों को मिलता है।
वोकल फॉर लोकल: बड़े पैमाने पर फैक्ट्रियों में बनने वाली पीओपी मूर्तियों के कारण पारंपरिक मूर्तिकारों की आजीविका प्रभावित होती है।
कला को सम्मान: इसके अलावा, मिट्टी की मूर्तियों को अपने हाथों से तराशने वाले कारीगरों की मेहनत को सही मूल्य मिलता है।
आर्थिक मजबूती: इस तरह, इको-फ्रेंडली गणपति चुनकर आप न केवल पर्यावरण बचाते हैं, बल्कि ‘वोकल फॉर लोकल’ के तहत स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करते हैं।
- धार्मिक आस्था और परंपरा का सही पालन
शास्त्रों के अनुसार, गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की पार्थिव (मिट्टी की) प्रतिमा बनाकर ही पूजा करने का विधान है।
पौराणिक मान्यता: प्राचीन काल में नदियां और तालाब प्रकृति के मुख्य स्रोत माने जाते थे, इसलिए प्राकृतिक मिट्टी से बनी मूर्ति का विसर्जन पानी में करने का नियम बनाया गया था ताकि मिट्टी वापस मिट्टी में मिल जाए।
सच्ची भक्ति: पीओपी एक गैर-प्राकृतिक और कृत्रिम पदार्थ है, जो महीनों तक पानी में विघटित नहीं होता और विसर्जन के बाद खंडित अवस्था में तैरता रहता है। यह देखना धार्मिक दृष्टि से भी कष्टदायक होता है।
शुद्धता: इसके विपरीत, मिट्टी की मूर्ति का सही तरीके से विसर्जन होना हमारी धार्मिक आस्था और गरिमा के बिल्कुल अनुकूल है।
घर पर कैसे करें इको-फ्रेंडली विसर्जन?
अगर आप इस बार इको-फ्रेंडली गणपति ला रहे हैं, तो विसर्जन की प्रक्रिया और भी आसान हो जाती है:
एक साफ और बड़े बाल्टी या टब में पानी भरें।
बप्पा की मूर्ति को श्रद्धापूर्वक उस पानी में रखें।
2 से 4 घंटे के भीतर मिट्टी पूरी तरह से पानी में घुल जाएगी।
इस मिट्टी और पानी का उपयोग अपने घर के गमलों या बगीचे के पौधों में खाद के रूप में करें।
विघ्नहर्ता भगवान गणेश सभी के दुखों को हरने वाले और सृष्टि के रक्षक हैं। ऐसे में हमारी यह जिम्मेदारी बनती है कि हम उनकी पूजा इस तरह करें जिससे उनकी बनाई इस सुंदर सृष्टि को कोई नुकसान न पहुंचे।
इस गणेश चतुर्थी, आइए एक समझदार और जिम्मेदार नागरिक बनें। पीओपी की मूर्तियों को ‘ना’ कहें और इको-फ्रेंडली गणपति को अपने घर लाकर इस त्योहार को सच्चे अर्थों में शुभ और पर्यावरण-अनुकूल बनाएं।
गणपति बाप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया!
लेखक- Shivangi Pandey
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