देश में बढती बिजली की मांग
देश में तेजी से बढ़ती आबादी, उद्योगों के विस्तार एवं डिजिटल सेवाओं पर बढती निर्भरता, बिजली उपकरण आधारित जीवन शैली यह सब संकेत हैं आने वाले वर्षों में बिजली की मांग लगातार बढ़ती जाएगी । ऐसे में सरकार, ऊर्जा कंपनियों एवं वितरण एजेंसियों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यही रहेगी कि संकट बढ़ने से पूर्व बढ़ती जरूरतों को कैसे पूरा किया जाता रहे।
बिजली की मांग में क्यों आया उछाल
निवेश सूचना एवं क्रेडिट रेटिंग एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2026-27 के दौरान बिजली की मांग में 5.0 से 5.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। यह आंकड़ा इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि पिछले साल (2025-26) बिजली की मांग में सिर्फ 1 प्रतिशत की मामूली वृद्धि देखी गई थी।
बिजली की इस बढ़ती मांग के पीछे मुख्य रूप से कमर्शियल और इंडस्ट्रियल एक्टिविटीज का बढ़ना है। जैसे-जैसे देश में व्यापार और फैक्ट्रियां रफ्तार पकड़ रही हैं, वैसे-वैसे बिजली की जरूरत भी बढ़ रही है। इसके अलावा, अब हमारे जीवन में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) और बड़े-बड़े डेटा सेंटर्स की एंट्री हो चुकी है, जिन्हें चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली चाहिए।
क्यों महंगी होगी बिजली?
देश में उद्योगों, EV और डाटा सेंटर की बढ़ती गतिविधियों के कारण वर्ष 2026-27 में बिजली की मांग बढ़ने का अनुमान सपष्ट दिखाई दे रहा है। इस वर्ष कम वर्षा का अनुमान है, बिजली की बढ़ती खपत और बिजली कंपनियों की आर्थिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है I
देश में बिजली की डिमांड में जबरदस्त उछाल आने का अनुमान लगाया जा रहा है। अनुमान के अनुसार अगले वित्त वर्ष में बिजली की मांग 5 से 5.5 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। यह आंकड़ा इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि 2025-26 में बिजली की मांग में केवल एक प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
मानसून के दुष्प्रभाव
आशंका जताई जा रही है कि देश में अगले वित्त वर्ष में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है। यदि बारिश कम हुई, तो खेती के लिए पंप पर निर्भरता बढ़ेगी, ज्यादा पम्प चलाने पड़ेंगे एवं भीषण गर्मी के कारण घरों में एसी-कूलर का प्रयोग बढ़ेगा। अर्थात घरेलू और कृषि क्षेत्र सहित उद्योगों में अधिकतम बिजली प्रयोग से बिजली की मांग तेज गति से बढ़ेगी।
इधर, तापीय बिजली संयंत्रों का क्षमता उपयोग यानी पीएलएफ वर्तमान में लगभग 65-66 प्रतिशत है। अनुमान है कि मांग बढ़ने के बावजूद यह पीएलएफ 65 प्रतिशत के करीब ही रहेगा। इसकी वजह यह है कि देश में नवीकरणीय ऊर्जा (सोलर और विंड एनर्जी) का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है और थर्मल सेक्टर में भी करीब 6 गीगावाट की नई क्षमता जुड़ने वाली है।
कोयले का भंडार और कर्ज का जाल
भारत में एक बार फिर थर्मल पावर सेक्टर में निवेश बढ़ाया जा रहा है, जबकि सौर और पवन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा भी तेजी से आगे बढ़ रही है। उन्होंने ये भी बताया कि 8 अप्रैल 2026 तक हमारे बिजली संयंत्रों के पास लगभग 19 दिनों का कोयला स्टॉक मौजूद था, जो किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए काफी माना जाता है। लेकिन असली समस्या बिजली बांटने वाली कंपनियों के साथ है।
डिस्कॉम कंपनियों के घाटे में थोड़ा सुधार तो हुआ है। मार्च 2024 में इन कंपनियों पर 7.4 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था, जो मार्च 2025 तक घटकर 7.1 लाख करोड़ रुपये रह गया है। आंकड़े सुनने में अच्छे लगते हैं, किन्तु चिंताजनक पहलू यह है कि कंपनियों की कमाई को देखते हुए इतना भारी कर्ज अभी भी ‘टिकाऊ’ नहीं है। यानी ये कंपनियां अब भी खतरे के निशान पर हैं।
राज्यों ने जारी किए नए टैरिफ
अप्रैल 2026 तक देश के 28 में से 17 राज्यों में नए वित्त वर्ष के लिए नए बिजली शुल्क आदेश जारी कर दिए हैं। हालांकि अधिकतम राज्यों में बिजली दरों में बहुत सीमित बढ़ोतरी की है।
यदि बिजली खरीद लागत बढ़ती है और शुल्क वृद्धि सीमित रहती है, तो वर्ष 2026-27 में प्रति यूनिट नकद अंतर 30-33 पैसे के ऊंचे स्तर पर बने रहने का अनुमान है।
लेखक: प्रमोद कुमार
प्रकाशित: 9 may 2026
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