“नारी शक्ति वंदन विधेयक” अर्थात महिला आरक्षण बिल संसद में पास न हो पाने के पीछे सिर्फ एक तकनीकी कारण नहीं था, बल्कि कई गहरे राजनीतिक कारण भी हैं I
सदन में संविधान संशोधन विधेयक पास होने के लिए 2/3 बहुमत चाहिए होता है, अतः इस बिल के पक्ष में 298 वोट ही मिल सके जबकि इस विधेयक को पास करवाने हेतु लगभग 352 वोट प्राप्त होना अत्यंत आवश्यक था । इसके पीछे संख्या की राजनीति सबसे बड़ा कारण बनी। इस नम्बर गेम में पहली बार मोदी के नेतृत्व में सरकार सदन में कोई बिल पर संख्या बल में हारी है, यह किसी कूटनीति का हिस्सा रहा या भाजपा के कमजोर होने के संकेत इस पर देश-विदेश में बहस जारी है, सभी लोग अपने-अपने तर्कों से विश्लेषण कर रहे हैं I
फिर राजनीती की भेंट चढ़ा : महिला आरक्षण
संसद में विपक्ष ने बिल का खुलकर समर्थन नहीं किया। कुछ नेताओं जैसे राहुल गांधी का तो कहना था कि यह सिर्फ महिला आरक्षण नहीं, बल्कि पूरे चुनावी ढांचे को बदलने का प्रयास है। इसलिए विरोध केवल “महिला आरक्षण” के खिलाफ नहीं, बल्कि विपक्ष का प्रश्न सरकार की राजनीतिक मंशा पर था। विपक्ष की धारणा थी कि बिल को सीटों की संख्या बढ़ाने और नए सीमांकन से जोड़ा जायेगा साथ ही विपक्ष को डर था कि इससे भविष्य में होने वाले चुनावों में राजनीतिक संतुलन बिगड़ सकता है इसलिए यह सबसे बड़ा “राजनीतिक अविश्वास” का मुद्दा बना।
वहीं सरकार ने विपक्ष पर “महिलाओं के अधिकार का विरोध” करने का आरोप लगाया। विपक्ष द्वारा भी इसे “लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ” उठाये जाने वाला कदम बताया। अतः संसद के इस विशेष सत्र में जहाँ इस विधेयक पर सहमति बननी चाहिए थी वहीं सम्पूर्ण विपक्ष ने इसे एक राजनीतिक ध्रुवीकरण किये जाने माध्यम बताने का प्रयास किया।
सरकार बनाना चाहती थी इतिहास
नारी शक्ति वंदन सरकार की एक ऐतिहासिक उपलब्धि बन सकती थी। किन्तु असम और बंगाल में चल रहे चुनावी माहौल की देखते हुए विपक्ष को लगा कि इससे सरकार को चुनावी फायदा मिल सकता है । इसलिए विपक्ष ने समर्थन नहीं दिया अपितु यह पूरा मुद्दा केडिट लेने तक सिमट कर रह गया। साथ ही विधेयक के स्वरुप पर भी कुछ दलों की आपत्तियां थीं जिसके कारण विपक्षी दल ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटा की मांग कर रहे थे I मुद्दा तत्काल लागू करने बनाम जनगणना/सीमांकन के बाद लागू करने का भी रहा अर्थात सभी दल महिला आरक्षण के विरोध में नहीं थे, लेकिन बिल के डिजाइन पर सहमत नहीं थे ।
महिलाओं को देश के नेतृत्व में भागीदारी सुनिश्चित करने का यह एक निर्णायक संशोधन हो सकता था , सरकार का यही प्रयास रहा होगा I जब देश की आधी आबादी कही जाने वाली महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़कर साथ खड़ी हैं ऐसे में उन्हें नेतृत्व में हिस्सेदारी होना अत्यंत जरुरी भी है, इस भावना को सरकार समझ रही थी और कहीं न कहीं मोदी की प्राथमिकता में भी महिलाओं को प्रोत्साहित करना भी रहता है I
फ्लोर मैनेजमेंट की कमी
सदन में सरकार के पास अकेले 2/3 बहुमत नहीं था अतः सहयोगी दलों और विपक्ष के बिना बिल पास करना मुश्किल था I ऐसे में सरकार द्वारा अन्य दलों से समन्वय शायद सही से नहीं किया जा सका, उनका विश्वास में न लिया जाना एवं उनके साथ अच्छे संबंधों की कमी भी इसका कारण हो सकती है I इसमें गठबंधन राजनीति के कारण भी बाधा उत्पन्न हुई, क्योंकि गैर भाजापायों में से सभी को ममता बैनर्जी का साथ चाहिए, और जब अब ममता चुनावी समर में हैं ऐसे में सभी विपक्षीदल, कांग्रेस सहित सभी दल ममता को अपनी निष्ठा और कितने बड़े साथी हैं ऐसा सिद्ध करना चाहते हैं I
इस सब के मध्य पुर्व में भाजपा के अरुण जेटली और अनंत कुमार की सहसा याद आ जाती है, जब वे थे तो उनका फ्लोर मैनेजमेंट हमेशा कठिन समय में चर्चा का विषय रहा I आज भी ऐसा कुछ किये जाने की अपेक्षा रही होगी, किन्तु देश हित में यह नहीं हो सका I
विपक्ष हुआ एक्सपोज
नारी शक्ति वंदन विधेयक के लिए बुलाये गए विशेष सत्र में भी विपक्ष अपने स्वभाव के अनुरूप विरोध तो कर रहा था, किन्तु उनके बहुत से तर्क केवल विरोध के लिए विरोध करने जैसे प्रतीत हो रहे थे I सपा प्रमुख अखिलेश की मुस्लिम महिलाओं की वकालत के तर्कहीन बातें अपनी ही बातों का अंतर्द्वंद जैसा दृश्य उत्पन्न कर रही थीं तो कांग्रेस नेता राहुल और प्रियंका भी केवल चुनाव और जनगणना का हौवा दिखाकर विषय से ध्यान हटाते दिखे I वही हनुमान बेनीवाल का रुख यह रहा है कि महिला आरक्षण का कानून तुरंत लागू होना चाहिए और उसमें ओबीसी व अन्य कमजोर वर्गों की महिलाओं के लिए कोटा (सब-कोटा) शामिल होना चाहिए, न कि इसे परिसीमन के बहाने लटकाया जाना चाहिए। वही चंद्रशेखर आजाद ने 33 प्रतिशत आरक्षण की नाकाफी बताते हुए इसे पचास प्रतिशत करने की अपील की I आम आदमी पार्टी और अन्य ममता एवं कांग्रेस सहयोगी दल खुले तौर पर विरोध दर्ज करने की हिम्मत तो नहीं दिखा पा रहे थे, इसलिए उन्होंने विधेयक में कुछ न कुछ कमी बताकर, अपना मत विरोध में ही दिया, यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है I
कब कब और कैसे कैसे अटका
यह विधेयक पहली बार 1996 में पेश किया गया था, प्रधानमंत्री देवगौड़ा के कार्यकाल में 11 वीं लोकसभा के समय यह विधेयक सदन में आया था और अंततः सितंबर 2023 में संसद के दोनों सदनों में पारित हुआ। उसके बाद दिसंबर 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 12 वीं लोकसभा में यह बिल पुनः सदन में लाया गया । उसके बाद मनमोहन सिंह सरकार के समय 2008 में लोकसभा की बजाय राज्यसभा में यह विधेयक लाया गया तब उसे संसद की स्थाई समिति को भेजा गया था और उसकी एक रिपोर्ट के बाद 9 मार्च 2010 राज्य सभा में पास कर लोकसभा में भेजा गया I 15 वीं लोकसभा समाप्त होने के साथ-साथ ही यह बिल भी समाप्त माना गया I
17 वी लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली सरकार द्वारा इसे नए स्वरुप नारी शक्ति वंदन विधेयक के रूप में प्रस्तुत किया, जो सदन में एक बार फिर पारित न हो सका I


