हाल ही में Delhi University के लक्ष्मीबाई कॉलेज का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है, जिसने हर किसी का ध्यान खींचा है। वीडियो में कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. प्रत्यूष वंसला क्लासरूम की दीवारों पर गोबर और मिट्टी का लेप लगाते हुए नजर आ रही हैं। जाहिर है, इस तरह का दृश्य किसी भी यूनिवर्सिटी सेटअप में अनोखा माना जाएगा – और यही वजह है कि ये वीडियो जमकर वायरल हो गया।
लेकिन क्या वाकई क्लासरूम में सिर्फ गोबर लगाया गया? क्या यह किसी धार्मिक या परंपरागत कारण से किया गया था? या फिर इसके पीछे कोई और वैज्ञानिक सोच है?
चलिए, इस पूरे मामले की सच्चाई समझते हैं – खुद प्रिंसिपल के शब्दों में।
रिसर्च प्रोजेक्ट, वायरल वीडियो और सच्चाई
जब लोकल 18 की टीम लक्ष्मीबाई कॉलेज पहुंची, तो प्रिंसिपल डॉ. प्रत्यूष वंसला ने खुद इस वीडियो की पूरी पृष्ठभूमि बताई। उन्होंने कहा कि यह कोई धार्मिक या अंधविश्वास से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि एक पर्यावरण विज्ञान (EVS) के रिसर्च प्रोजेक्ट का हिस्सा है।
दरअसल, कॉलेज की पुरानी बिल्डिंग की छत पर पोर्टा केबिन्स लगे हुए हैं। गर्मियों में इन कमरों में भयंकर गर्मी हो जाती है, जो न केवल छात्रों बल्कि फैकल्टी के लिए भी परेशानी का कारण बनती है। इसी मुद्दे को समझते हुए “हीट स्ट्रेस कंट्रोल” पर एक प्रयोग शुरू किया गया।
ये गोबर नहीं, ‘नेचुरल कूलिंग मिक्स’ है!
प्रिंसिपल ने बताया कि दीवारों पर जो लेप लगाया गया, वो सिर्फ गोबर नहीं था। यह एक खास मिश्रण था जिसमें मुल्तानी मिट्टी, गोबर और अन्य प्राकृतिक तत्वों का मेल था। इस मिक्स का उद्देश्य यह दिखाना था कि कैसे पुराने जमाने में बिना किसी आधुनिक उपकरणों के लोग अपने घरों को ठंडा रखते थे। यह प्रयोग खासतौर पर छात्रों को सस्टेनेबल तकनीकों के बारे में जागरूक करने के लिए किया गया था।
जब कॉलेज का माली इस लेप को लगा रहा था, तो प्रिंसिपल ने भी उसमें भागीदारी दिखाई और हाथ बंटाया। इसी दौरान किसी ने वीडियो बना लिया और उसे सोशल मीडिया पर इस अंदाज़ में वायरल कर दिया कि मानो यह कोई अजीबो-गरीब गतिविधि हो रही हो।
छात्रों का जवाब – प्रिंसिपल के कमरे में ही गोबर!
इस वायरल वीडियो के बाद कुछ छात्रों ने अपनी प्रतिक्रिया में प्रिंसिपल के कमरे की दीवारों पर भी गोबर का लेप लगा दिया। जहां एक ओर यह विरोध का प्रतीक माना गया, वहीं दूसरी ओर डॉ. वंसला का रुख चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा कि उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं है।
“अगर छात्रों को इससे खुशी मिलती है, तो दीवार पर लगा गोबर वैसा ही रहेगा,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा।
उन्होंने ये भी साफ किया कि न तो उन्हें और न ही किसी अन्य स्टाफ सदस्य को इससे कोई बदबू या असहजता महसूस हो रही है।
सोशल मीडिया पर हंगामा, लेकिन असली मकसद कुछ और
यह घटना बताती है कि सोशल मीडिया पर चीजें किस तेजी से बाहर निकलकर वायरल हो जाती हैं, और कभी-कभी उसके पीछे की असल वजहें छिप जाती हैं। जहां कुछ लोगों ने इस वीडियो का मज़ाक उड़ाया, वहीं इसकी गहराई में जाएं तो यह एक व्यवहारिक और प्राकृतिक समाधान को परखने की कोशिश थी।
क्लासरूम में कूलिंग की इस पारंपरिक तकनीक को आज की पीढ़ी के सामने लाने का यह एक दिलचस्प प्रयास है। शायद अब समय आ गया है कि हम अपनी पुरानी, पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों को दोबारा देखने और समझने की कोशिश करें।
निष्कर्ष: गोबर नहीं, सोच में क्रांति
लक्ष्मीबाई कॉलेज की इस पहल को हम चाहे जिस नजर से देखें, लेकिन एक बात साफ है – यह केवल दीवारों पर गोबर लगाने की बात नहीं है। यह सोच में एक प्रयोग है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वाकई विकास की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर हो गए हैं? और क्या हमें फिर से प्रकृति की ओर लौटने की जरूरत है?
क्या आपने कभी सोचा था कि गोबर और मिट्टी की बातें एक रिसर्च का हिस्सा बनकर फिर से चर्चा में आ जाएंगी?
आपका क्या मानना है? क्या इस तरह के प्रयोग शिक्षण संस्थानों में होने चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट में ज़रूर बताएं।


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