मानसून के बाद अब सर्दी पर एल नीनो का खतरा

क्या इस साल कम पड़ेगी ठंड और बिगड़ेगा मौसम?

भारत में वर्ष 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून (Southwest Monsoon) 13% की बारिश की कमी (Deficit) के साथ समाप्त हो चुका है। मानसून में हुई इस गिरावट की वजह से देश के कई हिस्सों में जल संसाधन बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और किसानों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। लेकिन मौसम का यह संकट यहीं खत्म होता नहीं दिख रहा है। अब प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में एल नीनो (El Nino) तेजी से मजबूत हो रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, इस साल के अंत तक एल नीनो ‘बेहद मजबूत’ (Very Strong) श्रेणी में पहुंच सकता है।

ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या एल नीनो मानसून की ही तरह भारत की आने वाली सर्दियों को भी बर्बाद कर देगा? आइए समझते हैं कि आखिर एल नीनो का सर्दियों पर क्या असर पड़ता है, इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण क्या है और हमारी खेती-किसानी पर इसका क्या प्रभाव पड़ने वाला है।

क्या इस साल सर्दियों में पड़ेगी कम ठंड?

जब भी प्रशांत महासागर में एल नीनो की स्थिति मजबूत होती है, तो इसका सबसे स्पष्ट संकेत यह मिलता है कि भारत के कई हिस्सों में सर्दियों का तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो एल नीनो उष्णकटिबंधीय (Tropical) क्षेत्रों में हवा के बहने और ऊपर-नीचे उठने के विशाल पैटर्न में बड़ा बदलाव कर देता है।

भले ही यह बदलाव भारत से हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर में होता है, लेकिन इसका असर भारत के शीतकालीन मौसम को नियंत्रित करने वाली वायुमंडलीय प्रणालियों (Atmospheric Systems) पर सीधे तौर पर पड़ता है।

इतिहास पर नजर डालें तो 2015-16 की सर्दियां इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। उस वर्ष एक शक्तिशाली एल नीनो देखने को मिला था और मानसून में भारी कमी दर्ज की गई थी। इसके ठीक बाद भारत ने असामान्य रूप से एक गर्म सर्दी का सामना किया था। उस दौरान दिसंबर और जनवरी के महीनों में तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर बना रहा था और शीतकालीन वर्षा नाममात्र हुई थी। मौसम वैज्ञानिकों ने इस अप्रत्याशित गर्मी के पीछे मुख्य रूप से एल नीनो और वायुमंडलीय परिसंचरण में आए परिवर्तनों को जिम्मेदार ठहराया था।

क्या एल नीनो का मतलब हमेशा ‘सूखी सर्दी’ होता है?

सर्दियों के मौसम और एल नीनो के संबंध में सबसे दिलचस्प मोड़ यही आता है। आमतौर पर माना जाता है कि एल नीनो का मतलब सूखा मौसम है, लेकिन सर्दियों में ऐसा हर बार जरूरी नहीं होता।

उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत (Northwestern India) में सर्दियों के दौरान होने वाली अधिकांश बारिश पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) के कारण होती है। ये तूफान भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) और आसपास के क्षेत्रों से उत्पन्न होकर पूर्व की ओर बढ़ते हैं। यही विक्षोभ मैदानी इलाकों में सर्दियों की बारिश लाते हैं और हिमालय के पहाड़ी इलाकों में भारी बर्फबारी के लिए जिम्मेदार होते हैं।

विभिन्न शोधों और अध्ययनों से यह सामने आया है कि एल नीनो वायुमंडलीय परिसंचरण को इस तरह बदल सकता है कि यह पश्चिमी विक्षोभ के व्यवहार को और मजबूत कर दे। इसके परिणामस्वरूप, कुछ मामलों में एल नीनो के बावजूद उत्तर-पश्चिम भारत में सर्दियों में बारिश बढ़ भी सकती है।

कृषि और रबी फसलों पर मंडराता संकट

सर्दियों का मौसम भारत में केवल ‘ठंड का मौसम’ नहीं है, बल्कि यह देश की खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण समय होता है। यह समय रबी की फसलों (विशेषकर गेहूं, सरसों और चने) की बुवाई और उनकी बढ़त का मुख्य काल होता है।

यदि सर्दियों में तापमान सामान्य से अधिक रहता है या फिर वर्षा का चक्र अनिश्चित हो जाता है, तो इससे फसलों की पैदावार पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। पहले से ही मानसून की कमी झेल रहे किसानों के लिए सर्दियों का असामान्य तापमान एक नया संकट खड़ा कर सकता है।

निष्कर्ष: मौसम विभाग की टिकी नजरें

हालांकि, भारत की सर्दियों का मौसम केवल एल नीनो से ही तय नहीं होता, इसमें कई अन्य स्थानीय और वैश्विक समुद्री प्रभाव भी शामिल होते हैं। फिर भी, मौजूदा वैज्ञानिक आंकड़े और संकेत इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि इस साल सर्दियों में तापमान थोड़ा गर्म रह सकता है और मौसम का मिजाज अप्रत्याशित हो सकता है। फिलहाल देश भर के किसान और आम नागरिक मौसम विभाग के आने वाले बुलेटिन और सटीक चेतावनियों पर अपनी नजरें जमाए हुए हैं।

लेखक – Shivangi Pandey

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