भारत में पुलिस सुधारों की आवश्यकता

प्रमोद कुमार

दिल्ली में पुलिस कर्मियों द्वारा की गयी सामूहिक प्रतिक्रिया एक संकेत है, कि अब हमें पुलिस व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरुरत है, हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है गत 10 वर्षों में पुलिस व्यवस्था एवं कार्यशैली में बहुत हद तक सुधार होते देखे जा रहे हैं, विशेषकर महानगरों में एवं केंद्रीय पुलिस बलों में I हमें यह भी समझना होगा पुलिस राज्य शासन के अधीन आती है, इसलिए प्रदेश सरकारों इसमें ज्यादा कुछ करने की जरुरत है I

पुलिसकर्मियों में असंतोष क्यों ?

एक समय पुलिस ही शासन का प्रमुख चेहरा हुआ करती थी, कमोबेस आज भी ऐसा ही कुछ है, किन्तु बदलती जीवनशैली एवं समाज में शैक्षिक स्तर का बढ़ना एवं बढती जागरूकता का परिणाम है, जिसके कारण पुलिस की हनक कम और काम बढ़ता दिख रहा है I पुलिस को अब शासन कम पुलिसकर्मी मात्र समझा जाता है I कानूनों के प्रति बढ़ते जन जागरण के कारण अब पुलिस रुतबा घटा है, भ्रष्टाचार की ख़बरों के कारण भी समाज में उनके प्रति एक अलग धारणा बन गयी थी I बढ़ते कार्य के दबाव एवं समाज में पुलिस करा प्रति बदतली धारणा के कारण पुलिस में अलग तरह का वातावरण है I समय तो बदला किन्तु अधिकांशत: राज्यों में पुलिस को आधुनिकता नहीं मिल सकी एवं उन्हें ही सिर्फ करना है, बेल्ट की नौकरी होने के कारण उनसे अनुशासन एवं समर्पण ही करते रहने की अपेक्षा रहती है Iअब पुलिसकर्मियों को भी अहसास होने लगा है, की वो शासन ही नहीं मात्र वो एक कर्मी हैं, अतः उन्हें भी कल्याण के विषय में सोचना होगा, उनके परिवारों, उनके स्वाभिमान एवं सुविधा के लिए यथास्थान बात करनी होगी I सुरक्षित समाज, सक्षम पुलिस और न्यायपूर्ण व्यवस्था की आधारशिला, बदलते अपराध, आधुनिक तकनीक और नागरिकों की बढ़ती अपेक्षाओं के बीच भारतीय पुलिस व्यवस्था को संवेदनशील, पारदर्शी, तकनीकी रूप से दक्ष और जवाबदेह बनाने का समय अब आ गया है I

पुलिस सुधार क्यों जरूरी हैं

किसी भी लोकतांत्रिक देश की मजबूती केवल उसकी आर्थिक प्रगति, सैन्य शक्ति अथवा राजनीतिक स्थिरता से निर्धारित नहीं होती, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि वहां का आम नागरिक कितना सुरक्षित महसूस करता है और उसे न्याय मिलने की कितनी उम्मीद है। देश में कानून का शासन स्थापित करने, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने, अपराधों पर नियंत्रण रखने तथा सामाजिक शांति बनाए रखने में पुलिस की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।

भारत आज तेजी से बदलते सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी परिवेश से गुजर रहा है। अपराधों का स्वरूप भी बदल रहा है। साइबर अपराध, डिजिटल धोखाधड़ी, संगठित अपराध, आर्थिक अपराध, मानव तस्करी, नशीले पदार्थों का कारोबार, महिला एवं बाल अपराध और आतंकवादी गतिविधियां पुलिस के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं। ऐसे में यह अपेक्षा करना कि पारंपरिक कार्यशैली, पुराने संसाधनों और सीमित प्रशिक्षण के सहारे आधुनिक अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा, व्यावहारिक नहीं है।  इसलिए भारत में पुलिस सुधार अब केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि सुशासन, लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक सुरक्षा की अनिवार्य शर्त बन चुके हैं।

बढ़ता काम नाकाफी संसाधन

अनेक राज्यों में पुलिस बल स्वीकृत पदों की तुलना में कम कर्मचारियों के साथ काम करता है। लंबे कार्य घंटे, छुट्टियों का अभाव, लगातार वीआईपी ड्यूटी, कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी और जांच का अतिरिक्त बोझ पुलिसकर्मियों की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है।

पुलिस व्यवस्था का ऐतिहासिक ढांचा मुख्यतः नियंत्रण और दमन की प्रशासनिक सोच से विकसित हुआ था। लोकतांत्रिक भारत में पुलिस की भूमिका नागरिकों पर नियंत्रण रखने वाली संस्था की नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा और सेवा करने वाली संस्था की होनी चाहिए। जांच और कानून-व्यवस्था का एक ही बल पर बोझ: थानों में तैनात पुलिसकर्मियों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ अपराधों की विवेचना भी करनी पड़ती है। इससे गंभीर मामलों की जांच प्रभावित होती है। कई स्थानों पर आधुनिक फॉरेंसिक सुविधाओं, साइबर विशेषज्ञों, डिजिटल साक्ष्य विश्लेषण और अत्याधुनिक जांच उपकरणों का अभाव है।

अत्याधुनिक हो पुलिस

आज अपराधी तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, इसलिए पुलिस को भी तकनीकी रूप से उनसे आगे रहने की आवश्यकता है। साइबर अपराध नियंत्रण के लिए विशेष व्यवस्था की बात करें तो समझ में आएगा जहाँ प्रत्येक जिले में सक्षम साइबर अपराध इकाई होनी चाहिए। पुलिसकर्मियों को डिजिटल फ्रॉड, ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी, पहचान की चोरी, सोशल मीडिया अपराध, डीपफेक, साइबर स्टॉकिंग और डिजिटल ब्लैकमेलिंग की जांच का विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा एनालिटिक्स के माध्यम से अपराध के पैटर्न का विश्लेषण, संदिग्ध गतिविधियों की पहचान, अपराध संभावित क्षेत्रों का अध्ययन और उपलब्ध सूचनाओं के समन्वय में एआई की मदद ली जा सकती है। हालांकि इसका उपयोग मानवीय निगरानी, निजता और संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के साथ होना चाहिए।

शहरों और संवेदनशील क्षेत्रों में सीसीटीवी नेटवर्क, स्मार्ट ट्रैफिक निगरानी, ड्रोन, जीपीएस आधारित पुलिस वाहन और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत किया जाना चाहिए। एफआईआर, शिकायत, केस की प्रगति, सत्यापन और नागरिक सेवाओं को अधिकाधिक डिजिटल एवं पारदर्शी बनाया जाना चाहिए, ताकि आम नागरिक को अनावश्यक रूप से थानों के चक्कर न लगाने पड़ें यह भी विचार करना होगा ।

वैज्ञानिक जांच और फॉरेंसिक का सहारा

आधुनिक पुलिस व्यवस्था की सफलता केवल अपराधी को गिरफ्तार करने में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर अपराध सिद्ध करने में है। हमें प्रत्येक राज्य में पर्याप्त संख्या में आधुनिक फॉरेंसिक लैब होनी चाहिए। डीएनए परीक्षण, फिंगरप्रिंट, डिजिटल फॉरेंसिक, बैलिस्टिक जांच, नार्कोटिक्स विश्लेषण और दस्तावेजों की वैज्ञानिक जांच के लिए विशेषज्ञ उपलब्ध होने चाहिए। पुलिस अधिकारियों को घटनास्थल का संरक्षण, साक्ष्य संग्रह, डिजिटल डेटा की सुरक्षित अभिरक्षा और न्यायालय में वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करने का प्रशिक्षण दिए जाने की भी मांग उठती रहती है ।

भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए पुलिसकर्मियों को नियमित प्रशिक्षण देना होगा । तकनीकी बदलावों के साथ कानूनी प्रक्रियाओं की समझ भी विकसित होनी चाहिए।

जवाबदेह और पारदर्शी पुलिस

पुलिस की शक्ति जितनी महत्वपूर्ण है, उसका जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग भी उतना ही आवश्यक है। लोकतंत्र में पुलिस कानून से ऊपर नहीं हो सकती। पुलिस के विरुद्ध दुर्व्यवहार, अवैध हिरासत, भ्रष्टाचार और अधिकारों के दुरुपयोग से संबंधित शिकायतों की निष्पक्ष जांच के लिए स्वतंत्र पुलिस शिकायत प्राधिकरण प्रभावी रूप से कार्यरत होने चाहिए। हिरासत कक्षों सहित निर्धारित पुलिस परिसरों में सीसीटीवी व्यवस्था और रिकॉर्ड का सुरक्षित संरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

किसी भी व्यक्ति के साथ अमानवीय व्यवहार, गैरकानूनी हिरासत अथवा यातना की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। पुलिस की कार्यशैली संविधान और कानून के अनुरूप होनी चाहिए।

पुलिस की नियुक्तियों, तबादलों और जांच संबंधी निर्णयों में अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकना आवश्यक है। पुलिस को कानून के प्रति जवाबदेह होना चाहिए, न कि किसी राजनीतिक व्यक्ति या दल के प्रति अतः राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्ति प्रदान करने बात यदा कदा होती ही रहती है ।

पुलिस बल का आधुनिकीकरण

पुलिस की कार्यक्षमता केवल अधिकारियों की योग्यता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उन्हें उपलब्ध कराए जाने वाले संसाधनों पर भी निर्भर करती है। आधुनिक हथियार और सुरक्षा उपकरण: पुलिस को अपराध की प्रकृति के अनुसार आधुनिक हथियार, बुलेटप्रूफ जैकेट, हेलमेट, बॉडी कैमरा, संचार उपकरण और सुरक्षा किट उपलब्ध कराई जानी चाहिए। प्रत्येक थाने में पर्याप्त संख्या में आधुनिक गश्ती वाहन, मोटरसाइकिल और आपातकालीन प्रतिक्रिया वाहन होने चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में भी पुलिस की त्वरित पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए। थानों को आधुनिक कार्यालयों के साथ नागरिक सुविधा केंद्रों के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। वहां महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों, बच्चों और दिव्यांगजनों के लिए अलग सहायता व्यवस्था होनी चाहिए।

पुलिस थानों, जिला मुख्यालयों, नियंत्रण कक्षों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के बीच सुरक्षित एवं त्वरित संचार नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए। महिला, बच्चों और कमजोर वर्गों की सुरक्षा को प्राथमिकता किसी भी पुलिस व्यवस्था की संवेदनशीलता का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि वह समाज के कमजोर और असुरक्षित वर्गों के साथ कैसा व्यवहार करती है। प्रत्येक जिले में महिला पुलिसकर्मियों की पर्याप्त नियुक्ति, महिला सहायता डेस्क, प्रशिक्षित जांच अधिकारी और त्वरित प्रतिक्रिया दल होने चाहिए। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की जांच संवेदनशीलता और समयबद्धता से होनी चाहिए।

पुलिस प्रशिक्षण और मानसिक स्वास्थ्य की मजबूती

अक्सर पुलिस सुधारों की चर्चा में हथियार, वाहन, तकनीक और भवनों पर तो ध्यान दिया जाता है, लेकिन पुलिसकर्मी स्वयं सबसे महत्वपूर्ण संसाधन हैं। पुलिसकर्मियों को केवल नियुक्ति के समय नहीं, बल्कि पूरे सेवाकाल में आधुनिक अपराध विज्ञान, कानून, तकनीक, मानवाधिकार, साइबर सुरक्षा, संवाद कौशल और तनाव प्रबंधन का प्रशिक्षण मिलना चाहिए।

लंबे कार्य घंटे, लगातार तनाव, आपातकालीन ड्यूटी और पारिवारिक जीवन के लिए सीमित समय पुलिसकर्मियों के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, मनोवैज्ञानिक परामर्श और तनाव प्रबंधन की व्यवस्था जरूरी है। प्रत्येक पुलिसकर्मी से हर प्रकार के अपराध की जांच की अपेक्षा करने के बजाय साइबर अपराध, आर्थिक अपराध, महिला अपराध, आतंकवाद, यातायात और संगठित अपराध जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता विकसित की जानी चाहिए। पर्याप्त अवकाश, निर्धारित ड्यूटी समय, बेहतर आवास और पारदर्शी पदोन्नति व्यवस्था से पुलिसकर्मियों का मनोबल बढ़ाया जा सकता है।

पुलिस सुधारों में स्वतंत्रता और संस्थागत स्वायत्तता

भारत में पुलिस सुधारों की चर्चा करते समय सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) निर्णय को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए। इस निर्णय में पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त करने, पुलिस स्थापना बोर्ड, राज्य सुरक्षा आयोग और पुलिस शिकायत प्राधिकरण जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए गए थे।

इन सुधारों का उद्देश्य पुलिस को मनमानी स्वतंत्रता देना नहीं, बल्कि उसे राजनीतिक दबाव से मुक्त रखते हुए कानून और संविधान के प्रति जवाबदेह बनाना है।

राज्य सरकारों को इन दिशा-निर्देशों की भावना के अनुरूप प्रभावी व्यवस्था लागू करनी चाहिए। पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति, अधिकारियों का निश्चित कार्यकाल, स्थानांतरण की पारदर्शी प्रक्रिया और जांच में पेशेवर स्वतंत्रता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

पुलिस और न्यायपालिका के मध्य समन्वय

पुलिस व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य केवल अपराधियों को पकड़ना नहीं, बल्कि पीड़ित को न्याय दिलाना है। इसके लिए पुलिस, अभियोजन विभाग, फॉरेंसिक संस्थानों और न्यायपालिका के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। विवेचना की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए जांच अधिकारियों और अभियोजन अधिकारियों के बीच नियमित संवाद हो, न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने वाले साक्ष्यों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता सुनिश्चित की जाए। गवाहों की सुरक्षा और पीड़ितों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए। लंबित मामलों की समीक्षा कर जांच में अनावश्यक देरी को कम किया जाए। निर्दोष व्यक्तियों को गलत तरीके से फंसाने और कमजोर साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई करने की प्रवृत्ति पर रोक लगे। अतः पुलिस की कार्यक्षमता का मूल्यांकन केवल गिरफ्तारियों की संख्या से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, दोषसिद्धि की गुणवत्ता और नागरिकों को मिले न्याय से होने की जरुरत महसूस हो रही है ।

ग्रामीण पुलसिंग

भारत की सुरक्षा केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों, दूरस्थ इलाकों, सीमावर्ती जिलों और औद्योगिक क्षेत्रों की सुरक्षा भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। ग्रामीण थानों में पर्याप्त पुलिस बल, आधुनिक वाहन, इंटरनेट, संचार उपकरण और महिला पुलिसकर्मियों की उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिए। सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय पुलिस, केंद्रीय सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों, संवेदनशील धार्मिक स्थलों और बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रशिक्षण और संसाधनों की व्यवस्था आवश्यक है।

भारत सरकार ने किये प्रयास

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए सहायता (ASUMP) योजना के माध्यम से राज्यों को आधुनिक तकनीक, हथियार, संचार उपकरण, फॉरेंसिक सुविधाओं और पुलिस अवसंरचना के विकास में सहायता दी जाती है। इसके अतिरिक्त, देश के 17,712 पुलिस थानों को CCTNS नेटवर्क के अंतर्गत शामिल किया गया है।

अभी और बाकि है

देश में प्रत्येक पांच वर्ष में पुलिस आधुनिकीकरण की राष्ट्रीय कार्ययोजना तैयार हो। प्रत्येक जिले में साइबर अपराध, फॉरेंसिक और तकनीकी जांच के विशेषज्ञ नियुक्त हों। पुलिस बल में रिक्त पदों को समयबद्ध तरीके से भरा जाए। प्रत्येक थाने को न्यूनतम आधुनिक संसाधनों और पर्याप्त मानवबल से लैस किया जाए। पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों को तकनीकी विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से जोड़ा जाए। पुलिस के कार्यों का मूल्यांकन नागरिक संतुष्टि, अपराध नियंत्रण, जांच की गुणवत्ता और जवाबदेही के आधार पर हो। पुलिस सुधारों की प्रगति की नियमित स्वतंत्र समीक्षा किये जाने की बात देश में अब बढ़ रही है ।

भय नहीं विश्वास का प्रतीक

भारत में पुलिस सुधारों का उद्देश्य केवल पुलिस को अधिक शक्तिशाली बनाना नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे अधिक सक्षम, संवेदनशील, आधुनिक, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाना होना चाहिए। पुलिस को भय का नहीं, विश्वास का प्रतीक बनाना होगा I एक आदर्श पुलिस व्यवस्था खड़ी  करनी होगी, और यह अमित शाह के गृह मंत्री रहते जनता को अपेक्षा ज्यादा है, उनकी पहचान के अनुरूप देशवासी अब उनसे ऐसी अपेक्षा कर रहे हैं I अपराधी कानून से भयभीत हो, निर्दोष नागरिक पुलिस के सामने स्वयं को सुरक्षित महसूस करे और पीड़ित व्यक्ति को न्याय की उम्मीद दिखाई दे। पुलिस की वर्दी का सम्मान केवल उसके अधिकारों और शक्तियों से नहीं, बल्कि उसके आचरण, ईमानदारी और जनसेवा की भावना से स्थापित होता है।

हमें यह भी समझना होगा कि पुलिसकर्मी केवल कानून लागू करने वाली मशीन नहीं हैं। वे भी इसी समाज का हिस्सा हैं। उनसे बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए उन्हें पर्याप्त संसाधन, सम्मानजनक कार्य परिस्थितियां, आधुनिक प्रशिक्षण और संस्थागत स्वतंत्रता देना सरकार तथा समाज दोनों की जिम्मेदारी है। आज आवश्यकता ऐसी पुलिस व्यवस्था विकसित करने की है जो तकनीक में आधुनिक, कार्यशैली में पेशेवर, व्यवहार में मानवीय, निर्णय में निष्पक्ष और संविधान के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध हो।

मजबूत पुलिस व्यवस्था का अर्थ केवल मजबूत कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि सुरक्षित नागरिक, सशक्त लोकतंत्र और न्यायपूर्ण राष्ट्र भी है।

लेखक : सोशल रिफार्म्स एंड रिसर्च ऑर्गनाइजेशन संस्थापक है I

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