दिल्ली सरकार के स्कूलों में आरएसएस पाठ्यक्रम: शिक्षा, विचारधारा और नई बहस

दिल्ली सरकार के स्कूलों में आरएसएस पाठ्यक्रम: शिक्षा, विचारधारा और नई बहस

प्रस्तावना

शिक्षा केवल पुस्तकों और अंकों तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह समाज, संस्कृति और मूल्यों का भी आधार होती है। हाल ही में दिल्ली सरकार ने अपने सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबंधित एक अध्याय को शामिल करने का निर्णय लिया है। इस कदम का उद्देश्य बताया जा रहा है कि छात्रों को संगठन के इतिहास, विचारधारा और गतिविधियों से परिचित कराया जाए। यह निर्णय शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी बहस को जन्म दे रहा है—क्या स्कूलों में विचारधारा आधारित पाठ्यक्रम शामिल किया जाना चाहिए या शिक्षा को केवल तटस्थ ज्ञान तक ही सीमित रखना चाहिए?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की पृष्ठभूमि

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। इसका मूल उद्देश्य भारतीय समाज में संगठन, अनुशासन और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करना था। समय के साथ आरएसएस भारत का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बन गया। इसकी शाखाएँ देशभर में सक्रिय हैं और विभिन्न सामाजिक, शैक्षिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों का संचालन करती हैं।

आरएसएस की विचारधारा “हिंदुत्व” और “भारतीय संस्कृति” के इर्द-गिर्द घूमती है। संगठन का मानना है कि भारतीय सभ्यता और परंपरा को आगे बढ़ाना ही राष्ट्र को सशक्त बनाने का मार्ग है।

दिल्ली सरकार का निर्णय

दिल्ली सरकार ने हाल ही में घोषणा की कि सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रम में आरएसएस पर आधारित पाठ पढ़ाया जाएगा। इस पहल का औपचारिक उद्देश्य छात्रों को संगठन की गतिविधियों, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और योगदान से परिचित कराना है। सरकार का मानना है कि इससे छात्रों को भारतीय समाज और राजनीति की वास्तविकताओं को बेहतर समझने का अवसर मिलेगा।

इस निर्णय के बाद शिक्षा जगत, राजनीतिक हलकों और अभिभावकों के बीच कई तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली हैं।

संभावित लाभ

इतिहास की समझ – छात्रों को यह जानने का अवसर मिलेगा कि आरएसएस ने भारतीय समाज पर किस प्रकार का प्रभाव डाला है।

संगठन और अनुशासन की सीख – आरएसएस का मूल मंत्र अनुशासन और संगठन पर आधारित है। यह छात्रों को जीवन प्रबंधन और नेतृत्व के गुण सिखा सकता है।

भारतीय संस्कृति से जुड़ाव – संगठन की गतिविधियों को जानने से छात्रों का भारतीय परंपरा, संस्कार और राष्ट्रीयता से जुड़ाव बढ़ सकता है।

राजनीतिक चेतना – पाठ्यक्रम में यह विषय आने से छात्रों को राजनीति, समाज और विचारधारा की गहराई से समझ विकसित करने का अवसर मिलेगा।

संभावित चुनौतियाँ और विवाद

विचारधारा का आरोप – आलोचकों का मानना है कि आरएसएस एक विशेष विचारधारा को बढ़ावा देता है। स्कूलों में इसे पढ़ाना बच्चों के मस्तिष्क पर एकतरफा प्रभाव डाल सकता है।

शिक्षा की तटस्थता पर सवाल – शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को निष्पक्ष जानकारी देना है। यदि किसी एक संगठन को विशेष महत्व दिया जाता है तो यह तटस्थता पर प्रश्नचिह्न लगा सकता है।

राजनीतिकरण का खतरा – विरोधियों का कहना है कि यह कदम शिक्षा को राजनीति से जोड़ने का प्रयास है।

धार्मिक विविधता का मुद्दा – भारत एक बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक देश है। आरएसएस पर आधारित पाठ उन समुदायों में असंतोष पैदा कर सकता है जो इसकी विचारधारा से सहमत नहीं हैं।

शिक्षा और विचारधारा का संतुलन

यह प्रश्न हमेशा से विवादित रहा है कि क्या शिक्षा को केवल विज्ञान, गणित और सामान्य ज्ञान तक सीमित रहना चाहिए या इसमें विचारधारा और मूल्यों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

यदि केवल तटस्थ शिक्षा दी जाती है तो छात्रों में मूल्य और पहचान की कमी हो सकती है।

लेकिन यदि शिक्षा किसी एक विचारधारा पर आधारित होगी तो यह समाज में विभाजन का कारण भी बन सकती है।

संतुलन का मार्ग यही है कि छात्रों को विभिन्न विचारधाराओं के बारे में निष्पक्ष जानकारी दी जाए। ताकि वे स्वयं सही-गलत का निर्णय कर सकें।

अन्य राज्यों और संस्थानों में उदाहरण

भारत के कई राज्यों में पाठ्यक्रम में महापुरुषों, सामाजिक संगठनों और विचारधाराओं पर अध्याय पहले से ही मौजूद हैं। उदाहरण के लिए –

महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर, भगत सिंह और नेहरू पर पढ़ाया जाता है।

कई राज्यों ने “भारतीय संस्कृति और मूल्य शिक्षा” को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया है।

इस दृष्टि से यदि आरएसएस पर भी एक अध्याय जोड़ा जाता है तो यह नया प्रयोग नहीं होगा, लेकिन इसकी राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता अधिक है।

छात्रों पर प्रभाव

सकारात्मक प्रभाव – छात्र अनुशासन, संगठन और सांस्कृतिक मूल्यों की ओर आकर्षित हो सकते हैं।

नकारात्मक प्रभाव – यदि विषय को एकतरफा दृष्टिकोण से पढ़ाया गया तो यह आलोचनात्मक सोच को बाधित कर सकता है।

जिज्ञासा और बहस – इस विषय पर पढ़ने के बाद छात्रों के बीच बहस, चर्चा और शोध की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।

समाज और राजनीति में बहस

यह निर्णय केवल शैक्षिक स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज और राजनीति में भी व्यापक बहस का कारण बन गया है।

समर्थक कहते हैं कि आरएसएस ने राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, इसलिए इसे पाठ्यक्रम में शामिल करना उचित है।

विरोधी कहते हैं कि यह शिक्षा को राजनीतिक रंग देने का प्रयास है और बच्चों की मानसिकता को एक विशेष दिशा में मोड़ सकता है।

अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका

दिल्ली सरकार के स्कूलों में आरएसएस पाठ्यक्रम: शिक्षा, विचारधारा और नई बहस

इस विषय में अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी।

शिक्षकों को चाहिए कि वे विषय को संतुलित और निष्पक्ष रूप से पढ़ाएँ।

अभिभावकों को भी यह ध्यान रखना होगा कि बच्चों के मन में आलोचनात्मक सोच विकसित हो और वे किसी भी विचारधारा को आंख मूंदकर स्वीकार न करें।

निष्कर्ष

दिल्ली सरकार द्वारा स्कूलों के पाठ्यक्रम में आरएसएस पर आधारित अध्याय शामिल करने का निर्णय शिक्षा जगत में नई बहस को जन्म देता है। एक ओर यह छात्रों को संगठन और भारतीय संस्कृति के बारे में जानकारी देगा, वहीं दूसरी ओर यह शिक्षा की तटस्थता और विचारधारा के प्रभाव पर प्रश्न उठाता है।

शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं है, बल्कि आलोचनात्मक सोच, सहिष्णुता और विवेकशीलता विकसित करना भी है। यदि आरएसएस के साथ-साथ अन्य विचारधाराओं और संगठनों को भी समान रूप से पढ़ाया जाए, तो छात्र सही मायने में लोकतांत्रिक मूल्यों को समझ पाएँगे।

अंततः, यह पहल तभी सफल हो सकती है जब इसे संतुलित दृष्टिकोण से लागू किया जाए और छात्रों को विभिन्न दृष्टिकोणों से परिचित कराकर उनकी सोच को व्यापक बनाया जाए।

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