मोनसून की रफ्तार क्यों धीमी पड़ रही है? जानिए बारिश की चाल रोक रहे 5 बड़े मौसमीय सिस्टम
भारत में जून का महीना आते ही लोगों की नजरें आसमान पर टिक जाती हैं। गर्मी से राहत, खेतों में बुवाई और जल संकट से उम्मीदें मानसून के साथ जुड़ी होती हैं। लेकिन इस बार मानसून की चाल सामान्य से कुछ धीमी दिखाई दे रही है। देश के कई हिस्सों में बारिश की शुरुआत होने के बावजूद उसकी रफ्तार लगातार नहीं बन पा रही है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इसके पीछे केवल एक नहीं बल्कि कई बड़े वायुमंडलीय कारण जिम्मेदार हैं।
19 जून 2026 तक मानसून दक्षिण भारत, पूर्वी राज्यों और पूर्वोत्तर के बड़े हिस्सों तक पहुंच चुका था, लेकिन मध्य, पश्चिम और उत्तर भारत के कई इलाकों में इसकी प्रगति अपेक्षा से धीमी रही। इसी कारण कई राज्यों में लोगों को बारिश की जगह उमस और गर्मी का सामना करना पड़ रहा है।
मानसून का कमजोर होना हमेशा कम बारिश का संकेत नहीं होता, लेकिन इसकी गति धीमी पड़ने के पीछे मौजूद कारणों को समझना बेहद जरूरी होता है क्योंकि यही आने वाले मौसम की दिशा तय करते हैं।
मोनसून आखिर आगे कैसे बढ़ता है?
मोनसून केवल बादलों का समूह नहीं है। यह समुद्र, तापमान, हवाओं की दिशा, दबाव प्रणाली और वायुमंडलीय ऊर्जा का संयुक्त परिणाम होता है। भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून मुख्य रूप से अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी के सहारे आगे बढ़ता है।
जब समुद्र से पर्याप्त नमी मिलती है, हवाओं का प्रवाह मजबूत रहता है और कम दबाव के क्षेत्र बनते हैं, तब बारिश का क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ता है। लेकिन इनमें से कोई भी कड़ी कमजोर हो जाए तो मानसून की गति प्रभावित हो जाती है।
पहला कारण: अरब सागर से आने वाली नमी कमजोर पड़ गई
मोनसून के लिए सबसे जरूरी चीज होती है समुद्र से मिलने वाली नमी। अरब सागर से उठने वाली हवाएं बड़ी मात्रा में जलवाष्प लेकर भारत के पश्चिमी और मध्य हिस्सों तक पहुंचती हैं। यही नमी बादलों के निर्माण और लगातार बारिश का आधार बनती है।
इस बार मौसमीय परिस्थितियों के कारण अरब सागर से आने वाली नमी अपेक्षाकृत कमजोर बताई जा रही है। इसका असर यह हुआ कि कई क्षेत्रों में बादल तो बने लेकिन पर्याप्त बारिश नहीं हो सकी।
नमी की कमी सीधे तौर पर मानसून की गति को प्रभावित करती है। जब वातावरण में जलवाष्प कम होती है तो बादल बनने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है और बारिश का विस्तार रुकने लगता है।
दूसरा कारण: दक्षिण-पश्चिमी हवाओं की ताकत कम होना
भारत में मोनसून को आगे बढ़ाने का सबसे बड़ा काम दक्षिण-पश्चिमी हवाएं करती हैं। ये हवाएं समुद्र से नमी लेकर देश के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंचाती हैं।
लेकिन जब इन हवाओं की ताकत कम हो जाती है तो बारिश भी कमजोर पड़ने लगती है।
इस बार ऐसी स्थिति देखने को मिल रही है कि कई क्षेत्रों में हवा का प्रवाह उतना मजबूत नहीं है जितना सामान्य मोनसून के दौरान होता है। इसका असर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों पर देखा जा सकता है।
कमजोर हवाओं की वजह से कई बार मौसम बादलों वाला दिखता है लेकिन बारिश नहीं होती।
तीसरा कारण: क्रॉस-इक्वेटोरियल फ्लो कमजोर होना
मौसम विज्ञान में क्रॉस-इक्वेटोरियल फ्लो एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है। इसका अर्थ है भूमध्य रेखा के दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर आने वाली हवाओं का प्रवाह।
ये हवाएं हिंद महासागर से ऊर्जा और नमी लेकर भारतीय क्षेत्र तक पहुंचती हैं। यही प्रक्रिया मानसून को ताकत देने का काम करती है।
जब यह फ्लो मजबूत रहता है तो बारिश की गतिविधियां बढ़ती हैं। लेकिन इसकी कमजोरी मानसून की चाल को धीमा कर सकती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बार इस प्रवाह में कमी देखने को मिली है, जिसका असर मानसून की प्रगति पर दिखाई दे रहा है।
चौथा कारण: लो-प्रेशर सिस्टम का पर्याप्त रूप से सक्रिय नहीं होना
भारत में अच्छी बारिश के पीछे कम दबाव वाले क्षेत्रों यानी लो-प्रेशर सिस्टम की बड़ी भूमिका होती है।
आमतौर पर बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बनने वाले लो-प्रेशर सिस्टम आसपास की नमी को खींचते हैं और बारिश को सक्रिय करते हैं। लेकिन जब ऐसे सिस्टम मजबूत नहीं बनते तो मानसून लंबे समय तक एक क्षेत्र में अटक सकता है।
इस समय यही स्थिति कई हिस्सों में देखने को मिल रही है। मजबूत दबाव प्रणाली की कमी के कारण बारिश की गति धीमी बनी हुई है।
इसका असर जलाशयों के स्तर, कृषि गतिविधियों और तापमान पर भी पड़ सकता है।
पांचवां कारण: MJO का कमजोर होना
MJO यानी मैडेन–जूलियन ऑस्सीलेशन एक वैश्विक मौसमीय प्रणाली है जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बादलों और वर्षा की गतिविधियों को प्रभावित करती है।
जब MJO सक्रिय अवस्था में होता है तो बादलों का विकास तेजी से होता है और वर्षा बढ़ने लगती है।
लेकिन जब यह कमजोर पड़ता है तो बारिश की गतिविधियां कम हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय MJO की स्थिति मानसून के लिए बहुत सहायक नहीं रही, जिसके कारण दक्षिण भारत से उत्तर भारत की ओर बारिश की सक्रियता कमजोर बनी हुई है।
किसानों और आम लोगों पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत की कृषि व्यवस्था अभी भी बड़े स्तर पर मानसून पर निर्भर है। यदि बारिश में देरी होती है तो कई फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है।
धान, सोयाबीन, कपास और अन्य खरीफ फसलें समय पर पानी मिलने पर बेहतर उत्पादन देती हैं। ऐसे में किसान मौसम अपडेट पर लगातार नजर बनाए रखते हैं।
शहरी क्षेत्रों में भी मानसून की देरी का असर दिखाई देता है। तापमान अधिक बना रहता है, बिजली की मांग बढ़ती है और उमस लोगों की परेशानी बढ़ाती है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि मानसून कई बार कुछ दिनों के लिए धीमा पड़ने के बाद अचानक सक्रिय हो जाता है और जुलाई में अच्छी बारिश दर्ज होती है।
आगे क्या उम्मीद की जा सकती है?
मौसम एक गतिशील प्रणाली है और इसमें तेजी से बदलाव संभव होता है।
यदि आने वाले दिनों में अरब सागर की नमी मजबूत होती है, दक्षिण-पश्चिमी हवाओं की गति बढ़ती है, लो-प्रेशर सिस्टम सक्रिय होते हैं और MJO अनुकूल स्थिति में आता है तो मानसून फिर तेजी पकड़ सकता है।
इसलिए अभी पूरे सीजन को कमजोर मानना जल्दबाजी होगी।
निष्कर्ष
भारत में मोनसून की धीमी रफ्तार के पीछे कई मौसमीय कारण एक साथ काम कर रहे हैं। अरब सागर की कमजोर नमी, दक्षिण-पश्चिमी हवाओं की कमी, क्रॉस-इक्वेटोरियल फ्लो में गिरावट, लो-प्रेशर सिस्टम की अनुपस्थिति और MJO की कमजोरी ने बारिश की गति को प्रभावित किया है।
हालांकि मौसम लगातार बदलता रहता है और आने वाले सप्ताहों में परिस्थितियां बेहतर हो सकती हैं। ऐसे में किसानों, नागरिकों और प्रशासन के लिए आधिकारिक मौसम अपडेट पर नजर बनाए रखना सबसे बेहतर विकल्प होगा।
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लेखक: क्रिष्णा पटेल
प्रकाशित: 20 June 2026
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