ईर्ष्या और निंदा आपको कुरूप बनाती है !

ईर्ष्या और निंदा

आपका स्वास्थ्य सही हो, देखने में हस्ट-पुष्ट तंदरुस्त हों, अच्छे घर परिवार में जन्म लिया है, खूब शिक्षित भी को, परिवार भी खूब सम्पन्न है, अच्छी बोली भाषा और सुंदर नैन नक्श है, किन्तु एक छोटा स दोष है, आप ईर्ष्यालु हैं, दूसरे आपसे कैसे अच्छे हो सकते हैं, इसलिए आप निंदा भी करते हैं, असल में ईर्ष्या और निंदा एक ही मर्ज के दुष्परिणाम हैं ।

असल में इन सभी बातों का अहसास जब होता है, जब आपको लोग उस रूप में नहीं लेते जिसके आप पात्र हैं, या जिसके आप अपने आपको पात्र समझते हैं । आप केवल इसी बात को देखते हैं कि लोग आपको सही से नहीं ले रहे है, और कुछ अहंकारी तो जिंदगी भर यह समझ ही नहीं पाते कि वह अहंकार रूपी दोष से बुरी तरह प्रभावित हैं । वह उनके व्यक्तित्व का तो नाश कर ही रहे हैं, साथ ही अपने आप से, अपने अपनों से, अपने दोस्तों से, समाज से उसे दूर कर रहे हैं, वह अपनी स्वाभाविक जिंदगी नहीं जी पा रहा । उसमें लाख अच्छाई होने पर भी उसे लोग पूछ नहीं रहे हैं ।

ईर्ष्या कैसे हमारे व्यक्तित्व में प्रवेश करती है, तथा हम कैसे जानें कि हम ईर्ष्यालु हो गए हैं ?

हमारे पारिवारिक संस्कार और वातावरण से बहुतायत संख्या में लोगों में ईर्ष्या का भाव बनना प्रारंभ होता है । उसके उपरांत अपने स्वभाव, अपनी संगति एवं स्वयं को बड़ा दिखाने का भाव जैसे ही अपने स्वभाव में जगने लग जाते हैं ।  वहीं से हमारा हम अपने आपको ईर्ष्यालु बनाने लग जाते हैं । अपने मन और हृदय का संकुचन भी इसका बहुत बड़ा कारण है । दूसरों को स्वीकार न करना, अपने सामने किसी की बात ही अच्छी न लगना । स्वयं की प्रतिष्ठा के लिए किसी भी स्तर तक उतर जाने का स्वभाव आपको ईर्ष्यालु बनाने के पर्याप्त है ।

क्यों हम न चाहते हुए भी ईर्ष्या जैसे दुर्गुण के शिकार होते हैं ?

जब जब हम दूसरों को देखकर अपने आपकी छवि बनाने की सोचेंगे तब तब हम इसके शिकार होंगे, किसी की प्रसंशा बर्दास्त ही न होने का स्वभाव भी आपको ईर्ष्यालु बनाने का मार्ग प्रशस्त करेगा । हमें यह भी ध्यान रखना होगा हमारी संगति कैसी है, क्योंकि हम जब ऐसे किसी गुट में फंस जाते हैं तो हम न चाहते हुए भी उसका पार्ट बन जाते हैं और धीरे धीरे वह धारणाएं हमारे मन में घर करने लग जाती हैं । इसलिए हमें ऐसे ग्रुप, संगति और व्यक्ति विशेष से तत्काल दूर हट जाना चाहिए तो ईर्ष्यालू प्रवृति का हो ।

लोग कहते हैं, महिलाओं में ईर्ष्यालु स्वभाव कुछ ज्यादा ही होता है ? क्या यह सत्य है ?

यह धारणा बिल्कुल गलत है, क्योंकि यह किसी लिंग विशेष से संबंधित नहीं, अपितु यह के मानवीय स्वभाव और दुर्गुण का विषय है । कोई भी व्यक्ति किसी भी दुर्गुण का शिकार हो सकता है, अब चाहे वह महिला हो या पुरुष हो । इसमें सबसे प्रमुखता से देखना यह है, कि यह दुर्गुण जिस किसी में भी हो, या आप देखें तो आप उससे तत्काल दूर हो जाएंगे तो अपने आपको समाज से विमुखता के कारण सोचने पर बाध्य हो जाएगा और जब समाज के लोग उससे दूर हटने लगेंगे तो वह अपनी और अपने व्यवहार,स्वभाव की समीक्षा करेगा, इसमें से जो समझदार होगा उसे अपने कमी दिख भी जाएगी और वह सुधार भी लेगा, किन्तु जिसे नहीं सुधारना उसे समय अपने आप सुधार देता है, और जिसे समय भी नहीं सुधार पाता उसे कोई नहीं सुधार सकता ।

इसमें संगति का क्या योगदान है ?

आपकी ईर्ष्यालु प्रवृति में आपकी संगति का भी बहुत बड़ा योगदान होता है । यदि आपके अंदर ईर्ष्यालु प्रवृति है और आपके निकतम के संगी साथी उसे प्रोत्साहित करते हैं, ऐसी बताओं को अनदेखा करते हैं तो वह आपके हितैसी नहीं सकते या फिर यह कहें कहें कि उनमें से भी अधिकतम लोग यदि ईर्ष्यालु हैं तो और भी मरना हो जाता है । क्योंकि ईर्ष्या आपके व्यक्तित्व में ऐसा दुर्गुण है, जो कि आपको जीते जी जलाने का काम करता है, अंदर और बाहर दोनों से । इसलिए संगति से सचेत रहें एवं संगति संभाल कर चुनें ।

इसमें घर वालाओं की भी कोई भूमिका है ? या फॉर वो क्या योगदान कर सकते हैं इस दुर्गुण को दूर हटाने में ?

घर आपकी पहली पाठशाला होती है । इसलिए आपके घर में यदि आपको रोक दिया जाता है, आपको ईर्ष्यालु स्वभाव एवं बर्ताव पर टोक दिया जाता है तो आप संभाल जाएंगे । इसलिए इसमें परिवार जनों का बड़ा योगदान होता है । घर में जितना पवित्र और सकारात्मक वातावरण होगा ऐसे ही असर आपके स्वभाव पर पड़ेगा । सभी सदस्यों का व्यक्तित्व सकारात्मक ऊर्जा से भरा रहेगा, परिवार में भी स्वस्थ वातावरण रहेगा और समाज में, व्यवसाय में जहां जहां भी आप जुड़े हैं वहाँ आप सकरात्मकता ही फैलाएंगे ।

क्या यह सच है, ईर्ष्या और पर निंदा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ? 

ईर्ष्या और निंदा

हाँ इनका बेस एक ही है, क्योंकि निंदा का जन्म पहले ईर्ष्या के रूप में ही आता है, या फिर यह कहें, कि ईर्ष्या, निंदा का आंतरिक रूप है । अपने आपको सदैव ऊपर देखने का स्वभाव, सामने वाले को स्वीकार न करने की वृति, असंतुष्ट स्वभाव, केवल सफलता ही पाने की चाह आपको ईर्ष्यालु बनाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । जब आप इस दुर्गुण से ओवरलोड हो जाते हैं तब आप निंदा का सहारा लेते हैं, और आप गर्त की ओर बढ़ते ही चले जाते हैं ।

ईर्ष्यालु और निंदक लोगों से दूर कैसे रहें, या उनकी पहचान कैसे करें ?

जिस समय भी आपके समक्ष कोई किसी की सामान्य रूप से भी बुराई करे, उसका उपहास उड़ाये, दूसरे के बारे में गलत भाषा का प्रयोग करे, किसी को नीचा दिखाने के लिए आपके सामने चिकनी चुपड़ी बात करे, तब आपको समझ जाना चाहिए कि इसकी नीयत और नीति ठीक नहीं, तत्काल ऐसे व्यक्ति से दूर हो जाओ । इसलिए कहा गया है, कि संगति आपको बना भी सकती और बिगाड़ भी सकती है ।

ईर्ष्यालु लोग घृणा के नहीं अपितु दया के पात्र हैं ?

इसलिए सभी से अनुरोध है, कृपया ईर्ष्यालु लोगों से घृणा नहीं अपितु उनके प्रति दया का भाव रखिए, क्योंकि उन्हें यह भान ही नहीं होता कि कि वे इस दुर्गुण के कारण क्या-क्या खो रहे हैं । उन्हें कहाँ जाना था और वो कहाँ अटके हैं । उन्हें किस लिए जन्म मिला, उन्हें कहाँ जाना था और वो कैसे अपने आपको पल प्रति पल जला रहे हैं । इसलिए कभी भी आपको किसी ईर्ष्यालु व्यक्ति से पाला पड़े तो आप उसकी ओर दया की दृष्टि से देखिए और आगे बढ़ जाइए ।

 

लेखक: प्रमोद कुमार
आध्यात्मिक वक्ता, नई दिल्ली, भारत

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