प्राकृतिक संसाधनों पर आधिपत्य का प्रचलन नया नहीं, पहले की अपेक्षा अब ताकतवर देश एक नई नई रणनीति के तहत करते हैं आधिपत्य ?
अमेरिका का ईरान से कोई आमने सामने का विवाद नहीं, किन्तु आज ईरान विश्व में हो रही अशांति के केंद्र में है | तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ा विश्व, अनेकों कारणों से, मानवता की रक्षा के लिए, यह युद्ध टालना चाहता है |
किन्तु कुछ देश अपने निजी स्वार्थो एवं विश्व में युद्ध का भय खड़ा करके, कुछ भी कर के निकला जा सकता है, इस अवधारणा पर चल रहे अमेरिका को समझना होगा |
प्राकृतिक संसाधनों की जंग

इराक पर अमेरिकी कार्यवाही और सत्ता के परिवर्तन की घटना सर्व विदित है. परमाणु भंडार एवं अस्त्रों के नाम पर जिस प्रकार से एक देश को बंधक बनाकर सत्ता बदल दी गयी और सभी तेल भंडारों एवं सम्बंधित उत्पादों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया गया था |
रूस,चीन और सऊदी अरब जैसे शक्तिशाली देशों पर हाथ डालना अमेरिका के लिए आसान नहीं, सत्ता के नियम ही है, सबसे पहले सबसे कमजोर को हथियाओ, उसी पर हुई कार्यवाही से आकी को सन्देश भी देने का काम किया जाये|
विश्व के सबसे बड़े कच्चे तेल के भण्डारक वेनुजुएला पर अमेरिकी कार्यवाही से साफ संकेत मिलते हैं, जहाँ जहाँ तेल है वहां वहां शक्तिशाली देश उनपर अपना येनकेन प्रकारेण आधिपत्य अथवा संसाधनों पर स्वामित्व कर लेने का दौर जारी है |
सीरिया का गृह युद्ध सबने देखा मानवता को शर्मशार कर देने वालों के पीछे कौन था ? उसके बाद उसका क्या हुआ ? और आज उस देश के प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति क्या है ? यह सम्पूर्ण विश्व देख रहा है | असल में खाड़ी सहयोग परिषद् के सभी सदस्य देशों पर अमेरिका की दृष्टि है |
ट्रंप की खुन्नस
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में ही ईरान के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अपना लिया था. न्यूक्लियर समझौते से बाहर निकलकर अमेरिका ने ईरान पर भारी आर्थिक प्रतिबन्ध लगाये थे.जिसका सीधा असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा और तेल की बिक्री बुरी तरह गिर गई. अब सत्ता में लौटने के बाद ट्रंप उसी नीति को और तेज करने में जुटे हैं.
ईरान पर दबाव डालने का मुख्य कारण कुछ और नहीं, अपितु आर्थिक और रणनीतिक हित हैं. अमेरिका चाहता है कि ईरान या तो नई शर्तों पर समझौता करे या फिर इतना कमजोर हो जाए कि उसकी नीति बदली जा सके. इस पूरे खेल में तेल, चीन और वैश्विक ताकत की होड़ इसके मूल में है. ट्रंप सरकार ने ईरान से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैक्स लगाने की नीति शुरू की. इसके साथ ही उन जहाजों पर भी नजर रखी जा रही है |
अमेरिका का अपरोक्ष युद्ध
अमेरिकी राष्ट्रपति ने सार्वजनिक तौर पर ईरान में हो रहे विरोध प्रदर्शनों का समर्थन किया, लेकिन जानकार मानते हैं कि यह समर्थन नहीं, बल्कि एक रणनीति है. ईरान की कमजोर होती स्थिति का फायदा उठाकर अमेरिका ईरान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर और अलग-थलग करना चाहता है. एवं अमेरिका फिलहाल खुली जंग से बचना चाहता है.
अगर बड़ा युद्ध हुआ और हॉर्मुज जलडमरूमध्य बंद हुआ, तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं. इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा, जिसमें खुद अमेरिका भी सम्मिलित है |
पिछले वर्ष के मध्य में इजरायल और ईरान के मध्य चली लड़ाई में अमेरिका ने इजरायल का साथ दिया. इस टकराव में ईरान की सैन्य शक्ति को नुकसान पहुंचा, ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की. इस वर्ष की शुरुआत में ईरान के भीतर हालात बिगड़ने लगे. महंगाई और बेरोजगारी से परेशान लोग सड़कों पर उतर आए, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ रहा है. ईरान को कमजोर करने की रणनीति पर अमेरिका सफल होता दिख रहा है |
युद्ध का भय एवं आंतरिक अस्थिरता
साल 2025 के मध्य में इजरायल और ईरान के बीच कुछ दिनों तक लड़ाई चली, जिसमें अमेरिका ने इजरायल का साथ दिया. इस टकराव में ईरान की सैन्य ताकत को नुकसान पहुंचा, हालांकि उसने भी जवाबी कार्रवाई की. इसके बाद 2026 की शुरुआत में ईरान के अंदर हालात बिगड़ने लगे.
महंगाई और बेरोजगारी से परेशान लोग सड़कों पर उतर आए, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ गया.
ऐसे ही यदि हालात और बिगड़ते गए, तो पूरा मिडिल ईस्ट में युद्ध की आशंका से नाकारा नहीं जा सकता. ईरान समर्थित गुटों की सक्रियता बढ़ने का खतरा है, इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है. भारत जैसे देशों को भी महंगे तेल और बढ़ती महंगाई का सामना करना पड़ सकता है.
परमाणु पर स्विट्जरलैंड के जिनेवा में अमेरिका-ईरान की द्वितीय वार्ता के समय ही अमेरिका द्वारा समुद्र क्षेत्र में अपने लड़ाकू विमानों की कार्यवाही करना, भय दिखाने और अपने हिसाब से बात मनवाने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है |
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चीन पर निशाना
ईरान तेल उत्पादन के मामले में दुनिया के बड़े देशों में शामिल है. हालांकि प्रतिबंधों के कारण उसका तेल निर्यात सीमित हो गया है और जो भी तेल बिक रहा है, उसका बड़ा हिस्सा चीन खरीद रहा है. ट्रंप प्रशासन चीन को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानता है, इसलिए ईरान पर दबाव बढ़ाकर वह चीन की ऊर्जा आपूर्ति को भी झटका देना चाहता है.


